Wednesday, July 2, 2008

कश्मीरियत पर कलंक



आखिरकार जम्मू-कश्मीर में अवसरवादी, विश्वासघाती और साथ ही राष्ट्रविरोधी राजनीति का एक और अध्याय लिख डाला गया। कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने विकृत चेहरे को पूरी तरह उजागर कर दिया। इस दल ने यह साबित किया कि वह चंद वोटों के लालच में किसी भी हद तक गिर सकता है। यद्यपि उसने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन हस्तांतरण के मसले पर राज्य सरकार को विचार-विमर्श के लिए 30 जून तक का समय दिया था, लेकिन महज इस भय से दो दिन पहले समर्थन वापसी की घोषणा कर दी ताकि लोगों को बरगलाने और ऐसा करके अमरनाथ तीर्थ यात्रियों को संकट में डालने की होड़ में किसी से पीछे न रह जाए। उसने अपने इस कृत्य से यह भी सिद्ध किया कि उसकी मानसिकता ठीक वैसी है जैसी कश्मीर घाटी के पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी नेताओं की है। इस पर आश्चर्य नहीं कि हुर्रियत कांफ्रेंस का तथाकथित नरम धड़ा और घाटी के छद्म उदारवादी नेता भी अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित करने के राज्य सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वे अपने कथित उदार और नरम रूप में भी मूलत: राष्ट्र विरोधी हैं। अब इन सबके साथ पीडीपी ने भी यह प्रमाणित कर दिया कि उसकी दृष्टि में कश्मीरियत वह है जिसमें हिंदुओं के लिए कहीं कोई स्थान नहीं-यहां तक कि प्रतीकात्मक रूप में भी नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो अमरनाथ यात्रियों के लिए अस्थायी शिविरों में रहने की अस्थायी व्यवस्था के विरोध में यह दुष्प्रचार नहीं होता कि हिंदुओं को घाटी में बसाने और कश्मीरी मुसलमानों को अल्पसंख्यक बनाने की साजिश हो रही है। अब कोई भी कहीं अधिक आसानी से यह समझ सकता है कि कश्मीर घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडित इतने वर्षो बाद भी अपने घरों को क्यों नहीं लौैट पा रहे हैं? राष्ट्र को यह समझने के साथ इस पर भी गौर करना होगा कि पीडीपी जैसा आचरण नेशनल कांफ्रेंस के नेता भी कर रहे हैं।

जिस तरह पीडीपी के मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती कश्मीर घाटी को निजी जागीर मानकर चल रही हैं उसी तरह नेशनल कांफ्रेंस के फारूख अब्दुल्ला और उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी बिना किसी शर्म-संकोच के कश्मीरियत की भद्दी व्याख्या कर रहे हैं। उमर अब्दुल्ला ने कश्मीरी राष्ट्रवाद का जो सवाल उठाया वह राष्ट्रीय एकता पर आघात करने वाला है। कश्मीरी राष्ट्रवाद की चर्चा करने का अर्थ है कि नेशनल कांफ्रेंस में कुछ भी राष्ट्रीय नहीं है। यह शर्मनाक है और साथ ही चिंताजनक भी कि कश्मीर घाटी आधारित राजनीतिक दल समग्र जम्मू-कश्मीर के हितों की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। नि:संदेह वे वोट बैंक बनाने के लिए व्याकुल हैं, लेकिन इस व्याकुलता में उन्हे मनमानी करने और भारतीय संविधान की धज्जिायां उड़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्हें केवल धिक्कारा ही नहीं, बल्कि चेताया भी जाना चाहिए। वस्तुत: यह सही समय है जब कश्मीर के राजनीतिक दलों को बताया जाए कि राज्य को जो विशेष अधिकार प्राप्त हैं वे उसी भारतीय संविधान के तहत हैं जिससे सारा राष्ट्र बंधा है। केंद्र को बिना किसी देरी के कश्मीर में हस्तक्षेप करना होगा ताकि राष्ट्रविरोधी राजनीति को हतोत्साहित करने के साथ कश्मीरियत तथा पंथनिरपेक्षता को और अधिक कलंकित होने से बचाया जा सके।


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