Wednesday, September 17, 2008

श्रीमद् भगवद्गीता

दसवाँ अध्याय

श्रीभगवानुवाच

 भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।  यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१०- १॥ 

फिर से, हे महाबाहो, तुम मेरे परम वचनों को सुनो । क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो इसलिय मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ ।

 न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।  अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥१०- २॥ 

न मेरे आदि (आरम्भ) को देवता लोग जानते हैं और न ही महान् ऋषि जन क्योंकि मैं ही सभी देवताओं का और महर्षियों का आदि हूँ ।

 यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।  असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१०- ३॥ 

जो मुझे अजम (जन्म हीन) और अन-आदि (जिसका कोई आरम्भ न हो) और इस संसार का महान ईश्वर (स्वामि) जानता है, वह मूर्खता रहित मनुष्य इस मृत्यु संसार में सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।

 बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।  सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥१०- ४॥  अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।   भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥१०- ५॥ 

बुद्धि, ज्ञान, मोहित होने का अभाव, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों पर संयम, मन की सैम्यता (संयम), सुख, दुख, होना और न होना, भय और अभय, प्राणियों की हिंसा न करना (अहिंसा), एक सा रहना एक सा देखना (समता), संतोष, तप, दान, यश, अपयश - प्राणियों के ये सभी अलग अलग भाव मुझ से ही होते हैं ।

 महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।  मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥१०- ६॥ 

पुर्वकाल में उत्पन्न हुये सप्त (सात) महर्षि, चार ब्रह्म कुमार, और मनु - ये सब मेरे द्वारा ही मन से (योग द्वारा) उत्पन्न हुये हैं और उनसे ही इस लोक में यह प्रजा हुई है ।

 एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।  सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥१०- ७॥ 

मेरी इस विभूति (संसार के जन्म कर्ता) और योग ऍश्वर्य को सार तक जानता है, वह अचल (भक्ति) योग में स्थिर हो जाता है, इसमें कोई शक नहीं ।

 अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।  इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥१०- ८॥ 

मैं ही सब कुछ का आरम्भ हूँ, मुझ से ही सबकुछ चलता है । यह मान कर बुद्धिमान लोग पूर्ण भाव से मुझे भजते हैं ।

 मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।  कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥१०- ९॥ 

मुझ में ही अपने चित्त को बसाऐ, मुझ में ही अपने प्राणों को संजोये, परस्पर एक दूसरे को मेरा बोध कराते हुये और मेरी बातें करते हुये मेरे भक्त सदा संतुष्ट रहते हैं और मुझ में ही रमते हैं ।

 तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।  ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥१०- १०॥ 

ऍसे भक्त जो सदा भक्ति भाव से भरे मुझे प्रीति पूर्ण ढंग से भजते हैं, उनहें मैं वह बुद्धि योग (सार युक्त बुद्धि) प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं ।

 तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।  नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥१०- ११॥ 

उन पर अपनी कृपा करने के लिये मैं उनके अन्तकरण में स्थित होकर, अज्ञान से उत्पन्न हुये उनके अँधकार को ज्ञान रूपी दीपक जला कर नष्ट कर देता हूँ ।

अर्जुन उवाच

 परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।  पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥१०- १२॥ 

आप ही परम ब्रह्म हैं, आप ही परम धाम हैं, आप ही परम पवित्र हैं, आप ही दिव्य शाश्वत पुरुष हैं, आप ही हे विभु आदि देव हैं, अजम हैं ।

 आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।  असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥१०- १३॥ 

सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, व्याल, व्यास जी आपको ऍसे ही बताते हैं । यहाँ तक की स्वयं आपने भी मुझ से यही कहा है ।

 सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।  न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥१०- १४॥ 

हे केशव, आपने मुझे जो कुछ भी बताया उस सब को मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन, आप के व्यक्त होने को न देवता जानते हैं और न ही दानव ।

 स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।  भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१०- १५॥ 

स्वयं आप ही अपने आप को जानते हैं हे पुरुषोत्तम । हे भूत भावन (जीवों के जन्म दाता) । हे भूतेश (जीवों के ईश) । हे देवों के देव । हे जगतपति ।

 वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।  याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१०- १६॥ 

आप जिन जिन विभूतियों से इस संसार में व्याप्त होकर विराजमान हैं, मुझे पुरी तरहं (अशेष) अपनी उन दिव्य आत्म विभूतियों का वर्णन कीजिय (आप ही करने में समर्थ हैं) ।

 कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।  केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१०- १७॥ 

हे योगी, मैं सदा आप का परिचिन्तन करता (आप के बारे में सोचता) हुआ किस प्रकार आप को जानूं (अर्थात किस प्रकार मैं आप का चिन्तन करूँ) । हे भगवन, मैं आपके किन किन भावों में आपका चिन्तन करूँ ।

 विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।  भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१०- १८॥ 

हे जनार्दन, आप आपनी योग विभूतियों के विस्तार को फिर से मुझे बताइये, क्योंकि आपके वचनों रुपी इस अमृत का पान करते (सुनते) अभी मैं तृप्त नहीं हुआ हूँ ।

श्रीभगवानुवाच

 हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।  प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१०- १९॥ 

मैं तुम्हें अपनी प्रधान प्रधान दिव्य आत्म विभूतियों के बारे में बताता हूँ क्योंकि हे कुरु श्रेष्ठ मेरे विसतार का कोई अन्त नहीं है ।

 अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।  अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०- २०॥ 

मैं आत्मा हूँ, हे गुडाकेश, सभी जीवों के अन्तकरण में स्थित । मैं ही सभी जीवों का आदि (जन्म), मध्य और अन्त भी हूँ ।

 आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।  मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥१०- २१॥ 

आदित्यों (अदिति के पुत्रों) में मैं विष्णु हूँ । और ज्योतियों में किरणों युक्त सूर्य हूँ । मरुतों (49 मरुत नाम के देवताओं) में से मैं मरीचि हूँ । और नक्षत्रों में शशि (चन्द्र) ।

 वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।  इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥१०- २२॥ 

वेदों में मैं साम वेद हूँ । देवताओं में इन्द्र । इन्द्रियों में मैं मन हूँ । और जीवों में चेतना ।

 रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।  वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥१०- २३॥ 

रुद्रों में मैं शंकर (शिव जी) हूँ, और यक्ष एवं राक्षसों में कुबेर हूँ । वसुयों में मैं अग्नि (पावक) हूँ । और शिखर वाले पर्वतों में मैं मेरु हूँ ।

 पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।  सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥१०- २४॥ 

हे पार्थ तुम मुझे पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति जानो । सेना पतियों में मुझे स्कन्ध जानो और जलाशयों में सागर ।

 महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।  यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥१०- २५॥ 

महर्षीयों में मैं भृगु हूँ, शब्दों में मैं एक ही अक्षर ॐ हूँ । यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ और न हिलने वालों में हिमालय ।

 अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।  गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥१०- २६॥ 

सभी वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ, और देव ऋर्षियों में नारद । गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ और सिद्धों में भगवान कपिल मुनि ।

 उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।  ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥१०- २७॥ 

सभी घोड़ों में से मुझे तुम अमृत के लिये किये सागर मंथन से उत्पन्न उच्चैश्रव समझो । हाथीयों का राजा ऐरावत समझो । और मनुष्यों में मनुष्यों का राजा समझो ।

 आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।  प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥१०- २८॥ 

शस्त्रों में मैं वज्र हूँ । गायों में कामधुक । प्रजा की बढौति करने वालों में कन्दर्प (काम देव) और सर्पों में मैं वासुकि हूँ ।

 अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।  पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥१०- २९॥ 

नागों में मैं अनन्त (शेष नाग) हूँ और जल के देवताओं में वरुण । पितरों में अर्यामा हूँ और नियंत्रित करने वालों में यम देव ।

 प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।  मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥१०- ३०॥ 

दैत्यों में मैं भक्त प्रह्लाद हूँ । परिवर्तन शीलों में मैं समय हूँ । हिरणों में मैं उनका इन्द्र अर्थात शेर हूँ और पक्षियों में वैनतेय (गरुड) ।

 पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।  झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥१०- ३१॥ 

पवित्र करने वालों में मैं पवन (हवा) हूँ और शस्त्र धारण करने वालों में भगवान राम । मछलियों में मैं मकर हूँ और नदीयों में जाह्नवी (गँगा) ।

 सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।  अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥१०- ३२॥ 

सृष्टि का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ हे अर्जुन । सभी विद्याओं मे से अध्यात्म विद्या मैं हूँ । और वाद विवाद करने वालों के वाद में तर्क मैं हूँ ।

 अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।  अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥१०- ३३॥ 

अक्षरों में अ मैं हूँ । मैं ही अन्तहीन (अक्षय) काल (समय) हूँ । मैं ही धाता हूँ (पालन करने वाला), मैं ही विश्व रूप (हर ओर स्थित हूँ) ।

 मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।  कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥१०- ३४॥ 

सब कुछ हर लेने वीली मृत्यु भी मैं हूँ और भविष्य में उत्पन्न होने वाले जीवों की उत्पत्ति भी मैं ही हूँ । नारीयों में कीर्ति (यश), श्री (धन संपत्ति सत्त्व), वाक शक्ति (बोलने की शक्ति), स्मृति (यादाश्त), मेधा (बुद्धि), धृति (स्थिरता) और क्षमा मैं हूँ ।

 बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।  मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥१०- ३५॥ 

गाये जाने वाली श्रुतियों (सामों) में मैं बृहत्साम हूँ और वैदिक छन्दों में गायत्री । महानों में मैं मार्ग-शीर्ष हूँ और ऋतुयों में कुसुमाकर (फूलों को करने वाली अर्थात वसन्त) ।

 द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।  जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥१०- ३६॥ 

छल करने वालों का जुआ मैं हूँ और तेजस्वियों का तेज मैं हूँ । मैं ही विजय (जीत) हूँ, मैं ही सही निश्चय (सही मार्ग) हूँ । मैं ही सात्विकों का सत्त्व हूँ ।

 वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।  मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥१०- ३७॥ 

वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ और पाण्डवों में धनंजय (अर्जुन) । मुनियों में मैं भगवान व्यास मुनि हूँ और सिद्ध कवियों में मैं उशना कवि (शुक्राचार्य) हूँ ।

 दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।  मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥१०- ३८॥ 

दमन (लागू) करने वालों में दण्ड नीति मैं हूँ और विजय की इच्छा रखने वालों में न्याय (नीति) मैं हूँ । गोपनीय बातों में मौनता मैं हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ ।

 यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।  न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥१०- ३९॥ 

जितने भी जीव हैं हे अर्जुन, उन सबका बीज मैं हूँ । ऍसा कोई भी चर अचर (चलने या न चलने वाला) जीव नहीं है जो मेरे बिना हो ।

 नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।  एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥१०- ४०॥ 

मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है हे परन्तप । मैने अपनी इन विभूतियों की विस्तार तुम्हें केवल कुछ उदाहरण देकर ही बताया है ।

 यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।  तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥१०- ४१॥ 

जो कुछ भी (प्राणी, वस्तु आदि) विभूति मयी है, सत्त्वशील है, श्री युक्त हैं अथवा शक्तिमान है, उसे तुम मेरे ही अंश के तेज से उत्पन्न हुआ जानो ।

 अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।  विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥१०- ४२॥ 

और इस के अतिरिक्त बहुत कुछ जानने की तुम्हें क्या आवश्यकता है हे अर्जुन । मैंने इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंश मात्र से प्रवेश करके स्थित कर रखा है ।



॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥



 ग्यारवाँ अध्याय

अर्जुन उवाच

 मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।  यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥११- १॥ 

मुझ पर अनुग्रह कर आपने यह परम गुह्य अध्यात्म ज्ञान जो मुझे बताया, आपके इन वचनों से मेरा मोह (अन्धकार) चला गया है ।

 भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।  त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥११- २॥ 

हे कमलपत्र नयन, मैंने आपसे सभी प्राणियों की उत्पत्ति और अन्त को विस्तार से सुना है और हे अव्यय, आपके महात्मय का वर्णन भी ।

 एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।  द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥११- ३॥ 

जैसा आप को बताया जाता है, है परमेश्वर, आप वैसे ही हैं । हे पुरुषोत्तम, मैं आप के ईश्वर रुप को देखना चाहता हूँ ।

 मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।  योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥११- ४॥ 

हे प्रभो, यदि आप मानते हैं कि आपके उस रुप को मेरे द्वारा देख पाना संभव है, तो हे योगेश्वर, मुझे आप अपने अव्यय आत्म स्वरुप के दर्शन करवा दीजिये ।

श्रीभगवानुवाच

 पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।  नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥११- ५॥ 

हे पार्थ, तुम मेरे रुपों का दर्शन करो । सैंकड़ों, हज़ारों, भिन्न भिन्न प्रकार के, दिव्य, भिन्न भिन्न वर्णों और आकृतियों वाले ।

 पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।  बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥११- ६॥ 

हे भारत, तुम आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनों, और मरुदों को देखो । और बहुत से पहले कभी न देखे गये आश्चर्यों को भी देखो ।

 इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।  मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥११- ७॥ 

हे गुडाकेश, तुम मेरी देह में एक जगह स्थित इस संपूर्ण चर-अचर जगत को देखो । और भी जो कुछ तुम्हे देखने की इच्छा हो, वह तुम मेरी इस देह सकते हो ।

 न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।  दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥११- ८॥ 

लेकिन तुम मुझे अपने इस आँखों से नहीं देख सकते । इसलिये, मैं तुम्हे दिव्य चक्षु (आँखें) प्रदान करता हूँ जिससे तुम मेरे योग ऍश्वर्य का दर्शन करो ।

संजय उवाच

 एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।  दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥११- ९॥ 

यह बोलने के बाद, हे राजन, महायोगेश्वर हरिः ने पार्थ को अपने परम ऍश्वर्यमयी रुप का दर्शन कराया ।

 अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।  अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥११- १०॥ 

अर्जुन ने देखा कि भगवान के अनेक मुख हैं, अनेक नेत्र हैं, अनेक अद्भुत दर्शन (रुप) हैं । उन्होंने अनेक दिव्य अभुषण पहने हुये हैं, और अनेकों दिव्य आयुध (शस्त्र) धारण किये हुये हैं ।

 दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।  सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११- ११॥ 

उन्होंने दिव्य मालायें और दिव्य वस्त्र धारण किये हुये हैं, दिव्य गन्धों से लिपित हैं । सर्व ऍश्वर्यमयी वे देव अनन्त रुप हैं, विश्व रुप (हर ओर स्थित) हैं ।

 दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।  यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११- १२॥ 

यदि आकाश में हज़ार (सहस्र) सूर्य भी एक साथ उदय हो जायें, शायद ही वे उन महात्मा के समान प्रकाशमयी हो पायें ।

 तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।  अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११- १३॥ 

तब पाण्डव (अर्जुन) ने उन देवों के देव, भगवान् हरि के शरीर में एक स्थान पर स्थित, अनेक विभागों में बंटे संपूर्ण संसार (कृत्स्न जगत) को देखा ।

 ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।  प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥११- १४॥ 

तब विस्मय (आश्चर्य) पू्र्ण होकर जिसके रोंगटे खड़े हो गये थे, उस धनंजयः ने उन देव को सिर झुका कर प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर बोले ।

अर्जुन उवाच

 पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।  ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥११- १५॥ 

हे देव, मुझे आप के देह में सभी देवता और अन्य समस्त जीव समूह, कमल आसन पर स्थित ब्रह्मा ईश्वर, सभी ऋषि, और दिव्य सर्प दिख रहे हैं ।

 अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।  नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर  विश्वरूप ॥११- १६॥ 

अनेक बाहें, अनेक पेट, अनेक मुख, अनेक नेत्र, हे देव, मैं आप को हर जगह देख रहा हूँ, हे अनन्त रुप । ना मुझे आपका अन्त, न मध्य, और न ही आदि (शुरुआत) दिख रहा, हे विश्वेश्वर (विश्व के ईश्वर), हे विश्व रुप (विश्व का रुप धारण किये हुये) ।

 किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।  पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११- १७॥ 

मुकुट, गदा और चक्र धारण किये, और अपनी तेजोराशि से संपूर्ण दिशाओं को दीप्त करते हुये, हे भगवन्, आप को मैं देखता हूँ, लेकिन आपका निरीक्षण करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि आप समस्त ओर से प्रकाशमयी, अप्रमेय (जिसके समान कोई न हो) तेजोमयी हैं ।

 त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।  त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११- १८॥ 

आप ही अक्षर (जिसका कभी नाश नहीं होता) हैं, आप ही परम हैं, आप ही जानना ज़रुरी है (जिन्हें जाना जाना चाहिये), आप ही इस विश्व के परम निधान (आश्रय) हैं । आप ही अव्यय (विकार हीन) हैं, मेरे मत में आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक सनातन पुरुष हैं ।

 अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।  पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११- १९॥ 

आप आदि, मध्य और अन्त रहित (अनादिमध्यान्तम), अनन्त वीर्य (पराक्रम), अनन्त बाहू (बाजुयें) हैं । चन्द्र (शशि) और सूर्य आपके नेत्र हैं । हे भगवन, मैं आपके आग्नि पूर्ण प्रज्वलित वक्त्रों (मूँहों) को देखता हूँ जो अपने तेज से इस विश्व को तपा (गरमा) रहे हैं ।

 द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।  दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११- २०॥ 

स्वर्ग (आकाश) और पृथिवी के बीच में जो भी स्थान है, सभी दिशाओं में, वह केवल एक आप के द्वारा ही व्याप्त है (स्वर्ग से लेकर पृथिवी तक केवल आप ही हैं) । आप के इस अद्भुत उग्र (घोर) रूप को देख कर, हे महात्मा, तीनों लोक प्रव्यथित (भय व्याकुल) हो रहे हैं ।

 अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।  स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११- २१॥ 

आप ही में देवता गण प्रवेश कर रहे हैं । कुछ भयभीत हुये हाथ जोड़े आप की स्तुति कर रहे हैं । महर्षी और सिद्ध गण स्वस्ति (कल्याण हो) उच्चारण कर उत्तम स्तुतियों द्वारा आप की प्रशंसा कर रहे हैं ।

 रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।  गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११- २२॥ 

रूद्र, आदित्य, वसु, साध्य गण, विश्वदेव, अश्विनी कुमार, मरूत गण, पितृ गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध गण - सब आप को विस्मय से देखते हैं ।

 रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।  बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥११- २३॥ 

हे महाबाहो, बहुत से मुख, बहुत से नेत्र, बहुत सी बाहुयें, बहुत सी जँगाऐं (उरु), पैर, बहुत से उदर (पेट), बहुत से विकराल दांतो वाले इस महान् रूप को देख कर यह संसार प्रव्यथित (भयभीत) हो रहा है और मैं भी ।

 नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।  दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥११- २४॥ 

आकाश को छूते, अनेकों प्रकार (वर्णों) वाले आपके दीप्तमान रूप, जिनके खुले हुये विशाल मुख हैं और प्रज्वलित (दिप्तमान) विशाल नेत्र हैं - आपके इस रुप को देख कर मेरी अन्तर आत्मा भयभीत (प्रव्यथित) हो रही है । न मुझे धैर्य मिल रहा हैं, हे विष्णु, और न ही शान्ति ।

 दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।  दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११- २५॥ 

आपके विकराल भयानक दाँतो को देख कर और काल-अग्नि के समान भयानक प्रज्वलित मुखों को देख कर मुझे दिशाओं कि सुध नहीं रही, न ही मुझे शान्ति प्राप्त हो रही है । प्रसन्न होईये हे देवेश (देवों के ईश), हे जगन्-निवास ।

 अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।  भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥११- २६॥  वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।  केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥११- २७॥ 

धृतराष्ट्र के सभी पुत्र और उनके साथ और भी राजा लोग, श्री भीष्म, द्रोण, तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी कई मुख्य योधा आप के भयानक विकराल दाँतों वाले मुखों में प्रवेश कर रहे हैं । और आप के दाँतों मे बीच फसें कईयों के सिर चूर्ण हुये दिखाई दे रहे हैं ।

 यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।  तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥११- २८॥ 

जैसे नदियों के अनेक जल प्रवाह वेग से समुद्र में प्रवेश करते हैं (की ओर बढते हैं), वैसे ही नर लोक (मनुष्य लोक) के यह योद्धा आप के प्रज्वलित मुखों में प्रवेश करते हैं ।

 यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।  तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥११- २९॥ 

जैसे जलती अग्नि में पतंगे बहुत तेज़ी से अपने ही नाश के लिये प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अपने नाश के लिये यह लोग अति वेग से आप के मुखों में प्रवेश करते हैं ।

 लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।  तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥११- ३०॥ 

अपने प्रज्वलित मुखों से इन संपूर्ण लोकों को निगलते हुये और हर ओर से समेटते हुये, हे विष्णु, आपका यह उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत में फैल कर इन लोकों को तपा रहा है ।

 आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।  विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥११- ३१॥ 

इस उग्र रुप वाले आप कौन हैं, मुझ से कहिये । आप को प्रणाम है हे देववर, प्रसन्न होईये । हे आदिदेव, मैं आप को अनुभव सहित जानना चाहता हूँ । मैं आपकी प्रवृत्ति अर्थात इस रुप लेने के कारण को नहीं जानता ।

श्रीभगवानुवाच

 कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।  ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥११- ३२॥ 

मैं संसार का क्षय करने के लिये प्रवृद्ध (बढा) हुआ काल हूँ । और इस समय इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ । तुम्हारे बिना भी, यहाँ तुम्हारे विपक्ष में जो योद्धा गण स्थित हैं, वे भविष्य में नहीं रहेंगे ।

 तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।  मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११- ३३॥ 

इसलिये तुम उठो और अपने शत्रुयों को जीत कर यश प्राप्त करो और समृद्ध राज्य भोगो । तुम्हारे यह शत्रु मेरे द्वारा पैहले से ही मारे जा चुके हैं, हे सव्यसाचिन्, तुम केवल निमित्त-मात्र (कहने को) ही बनो ।

 द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।  मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥११- ३४॥ 

द्रोण, श्री भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य वीर योधा भी, मेरे द्वारा (पहले ही) मारे जा चुके हैं । व्यथा (गलत आग्रह) त्यागो और युध करो, तुम रण में अपने शत्रुओं को जीतोगे ।

संजय उवाच

 एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।  नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥११- ३५॥ 

श्री केशव के इन वचनों को सुन कर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़ कर श्री कृष्ण को नमस्कार किया और काँपते हुये भयभीत हृदय से फिरसे प्रणाम करते हुये बोले ।

अर्जुन उवाच

 स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।  रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥११- ३६॥ 

यह योग्य है, हे हृषीकेश, कि यह जगत आप की कीर्ती का गुणगान कर हर्षित होतै है और अनुरागित (प्रेम युक्त) होता है । आप से भयभीत हो कर राक्षस हर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्ध गण आपको नमस्कार कर रहे हैं ।

 कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।  अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥११- ३७॥ 

और हे महात्मा, आपको नमस्कार करें भी क्यों नहीं । आप ही सबसे बढकर हैं, ब्रह्मा जी के भी आदि कर्ता हैं (ब्रह्मा जी के भी आदि हैं) । आप ही अनन्त हैं, देव-ईश हैं, जगत्-निवास हैं । आप ही अक्षर हैं, आप ही सत् और असत् हैं, और उन संज्ञाओं से भी परे जो है वह भी आप ही हैं ।

 त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।  वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥११- ३८॥ 

आप ही आदि-देव (पुरातन देव) हैं, सनातन पुरुष हैं, आप ही इस संसार के परम आश्रय (निधान) हैं । आप ही ज्ञाता हैं और ज्ञेय (जिन्हें जानना चाहिये) हैं । आप ही परम धाम हैं और आप से ही यह संपूर्ण संसार व्याप्त है, हे अनन्त रुप ।

 वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।  नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥११- ३९॥ 

आप ही वायु हैं, आप ही यम हैं, आप ही अग्नि हैं, आप ही वरुण (जल देवता) हैं, आप ही चन्द्र हैं, प्रजापति भी आप ही हैं, और प्रपितामहा (पितामह अर्थात पिता-के-पिता के भी पिता) भी आप हैं । आप को नमस्कार है, नमस्कार है, सहस्र (हज़ार) बार मैं आपको नमस्कार करता हूँ । और फिर से आपको नमस्कार है, नमस्कार है ।

 नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।  अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥११- ४०॥ 

हे सर्व, आप को आगे से नमस्कार है, पीछे से भी नमस्कार है, हर प्रकार से नमस्कार है । हे अनन्त वीर्य, हे अमित विक्रमशाली, सबमें आप समाये हुये हैं (व्याप्त हैं), आप ही सब कुछ हैं ।

 सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।  अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥११- ४१॥ 

हे भगवन्, आप को केवल आपना मित्र ही मान कर मैंने प्रमादवश (मूर्खता कारण) यां प्रेम वश आपको जो हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा (मित्र) - कह कर संबोधित किया, आप के महिमानता को न जानते हुये ।

 यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।  एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥११- ४२॥ 

और हास्य मज़ाक करते हुये, या चलते फिरते, लेटे हुये, बैठे हुये अथवा भोजन करते हुये, अकेले में या आप के सामने मैंने जो भी असत् व्यवहार किया हो (जितना आदर पूर्ण व्यहार करना चाहिये उतना न किया हो) उसके लिये, हे अप्रमेय, आप मुझे क्षमा कर दीजिये ।

 पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।  न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥११- ४३॥ 

आप इस चर-अचर लोक के पिता हैं, आप ही पूजनीय हैं, परम् गुरू हैं । हे अप्रतिम प्रभाव, इन तीनो लोकों में आप के बराबर (समान) ही कोई नहीं है, आप से बढकर तो कौन होगा भला ।

 तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।  पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥११- ४४॥ 

इसलिये मैं झुक कर आप को प्रणाम करता, मुझ से प्रसन्न होईये हे ईश्वर । जैसे एक पिता अपने पुत्र के, मित्र आपने मित्र के, औप प्रिय आपने प्रिय की गलतियों को क्षमा कर देता है, वैसे ही हे देव, आप मुझे क्षमा कर दीजिये ।

 अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।  तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११- ४५॥ 

जो मैंने पहले कभी नहीं देखा, आप के इस रुप को देख लेने पर मैं अति प्रसन्न हो रहा हूँ, और साथ ही साथ मेरा मन भय से प्रव्यथित (व्याकुल) भी हो रहा है । हे भगवन्, आप कृप्या कर मुझे अपना सौम्य देव रुप (चार बाहों वाला रुप) ही दिखाईये । प्रसन्न होईये, हे देवेश, हे जगन्निवास (इस जगत के निवास स्थान) ।

 किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।  तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥११- ४६॥ 

मैं आप को मुकुट धारण किये, और हाथों में गदा और चक्र धारण किये देखने का इच्छुक हूँ । हे भगवन्, आप चतुर्भुज (चार भुजाओं वाला) रुप धारण कर लीजिये, हे सहस्र बाहो (हज़ारों बाहों वाले), हे विश्व मूर्ते (विश्व रूप) ।

श्रीभगवानुवाच

 मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।  तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥११- ४७॥ 

हे अर्जुन, तुम पर प्रसन्न होकर मैंने तुम्हे अपनी योगशक्ति द्वारा इस परम रूप का दर्शन कराया है । मेरे इस तेजोमयी, अनन्त, आदि विश्व रूप को तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा है ।

 न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।  एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥११- ४८॥ 

हे कुरुप्रवीर (कुरूओं में श्रेष्ठ वीर), तुम्हारे अतिरिक्त इस नर लोक में कोई भी वेदों द्वारा, यज्ञों द्वारा, अध्ययन द्वारा, दान द्वारा, या क्रयाओं द्वारा (योग क्रियाऐं आदि), या फिर उग्र तप द्वारा भी मेरे इस रुप को नहीं देख सकता ।

 मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।  व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥११- ४९॥ 

मेरे इस घोर रुप को देख कर न तुम व्यथा करो न मूढ भाव हो (अतः भयभीत और स्तब्ध न हो) । तुम भयमुक्त होकर फिर से प्रिति पूर्ण मन से (प्रसन्न चित्त से) मेरे इस (सौम्य) रूप को देखो ।

संजय उवाच

 इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।  आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥११- ५०॥ 

अर्जुन को यह कह कर वासुदेव ने फिर से उन्हें अपने (सौम्य) रुप के दर्शन कराये । इस प्रकार उन महात्मा (भगवान्) ने भयभीत हुये अर्जुन को अपना सौम्य रूप दिखा कर आश्वासन दिया ।

अर्जुन उवाच

 दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।  इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥११- ५१॥ 

हे जनार्दन, आपके इस सौम्य (मधुर) मानुष रूप को देख कर शान्तचित्त हो कर अपनी प्रकृति को प्राप्त हो गया हूँ (अर्थात अब मेरी सुध बुध वापिस आ गई है) ।

श्रीभगवानुवाच

 सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।  देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥११- ५२॥ 

मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, इसे देख पाना अत्यन्त कठिन (अति दुर्लभ) है । इसे देखने की देवता भी सदा कामना करते हैं ।

 नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।  शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥११- ५३॥ 

न मुझे वेदों द्वारा, न तप द्वारा, न दान द्वारा और न ही यज्ञ द्वारा इस रूप में देखा जा सकता है, जिस रूप में मुझे तुमने देखा है हे अर्जुन ।

 भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।  ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥११- ५४॥ 

लेकिन अनन्य भक्ति द्वारा, हे अर्जुन, मुझे इस प्रकार (रूप को) जाना भी जा सकता है, देखा भी जा सकता है, और मेरे तत्व (सार) में प्रवेष भी किया जा सकता है हे परंतप ।

 मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।  निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥११- ५५॥ 

जो मनुष्य मेरे लिये ही कर्म करता है, मुझी की तरफ लगा हुआ है, मेरा भक्त है, और संग रहित है (दूसरी चीज़ों, विषयों के चिन्तन में डूबा हुआ नहीं है), सभी जीवों की तरफ वैर रहित है, वह भक्त मुझे प्राप्त करता है हे पाण्डव ।


॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ॥

 बारहवाँ अध्याय

अर्जुन उवाच

 एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।  ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥१२- १॥ 

दोनों में से कौन उत्तम हैं - जो भक्त सदा आपकी भक्ति युक्त रह कर आप की उपासना करते हैं, और जो अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं ।

श्रीभगवानुवाच

 मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।  श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥१२- २॥ 

जो भक्त मुझ में मन को लगा कर निरन्तर श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में उत्तम हैं ।

 ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।  सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥१२- ३॥ 

जो अक्षर, अनिर्देश्य (जिसके स्वरुप को बताया नहीं जा सकता), अव्यक्त, सर्वत्र गम्य (हर जगह उपस्थित), अचिन्तीय, सदा एक स्थान पर स्थित, अचल और ध्रुव (पक्का, न हिलने वाला) की उपासना करते हैं ।

 संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।  ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥१२- ४॥ 

इन्द्रियों के समूह को संयमित कर, हर ओर हर जगह समता की बुद्धि से देखते हुये, सभी प्राणीयों के हितकर, वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं ।

 क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।  अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥१२- ५॥ 

लेकिन उन के पथ में कठिनाई ज़्यादा है, जो अव्यक्त में चित्त लगाने में आसक्त हैं क्योंकि देह धारियों के लिये अव्यक्त को प्राप्त करना कठिन है ।

 ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।  अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥१२- ६॥ 

लेकिन जो सभी कर्मों को मुझ पर त्याग कर मुझी पर आसार हुये (मेरी प्राप्ति का लक्ष्य किये) अनन्य भक्ति योग द्वारा मुझ पर ध्यान करते हैं और मेरी उपासना करते हैं ।

 तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।  भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥१२- ७॥ 

ऍसे भक्तों को मैं बहुत जल्दि (बिना किसी देर किये) ही इस मृत्यु संसार रुपी सागर से उद्धार करने वाला बनता हूँ जिनका चित्त मुझ ही में लगा हुआ है (मुझ में ही समाया हुआ है) ।

 मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।  निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥१२- ८॥ 

इसलिये, अपने मन को मुझ में ही स्थापित करो, मुझ में ही अपनी बुद्धि को लगाओ, इस प्रकार करते हुये तुम केवल मुझ में ही निवास करोगे (मुझ में ही रहोगे), इस में को संशय नहीं है ।

 अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।  अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥१२- ९॥ 

और यदि तुम अपने चित्त को मुझ में स्थिरता से स्थापित (मुझ पर अटूट ध्यान) नहीं कर पा रहे हो, तो अभ्यास (भगवान में चित्त लगाने के अभ्यास) करो और मेरी ही इच्छा करो हे धनंजय ।

 अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।  मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥१२- १०॥ 

और यदि तुम मुझ में चित्त लगाने का अभ्यास करने में भी असमर्थ हो, तो मेरे लिये ही कर्म करने की ठानो । इस प्रकार, मेरे ही लिये कर्म करते हुये तुम सिद्धि (योग सिद्धि) प्राप्त कर लोगे ।

 अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।  सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥१२- ११॥ 

और यदि, तुम यह करने में भी सफल न हो पाओ, तो मेरे बताये योग का आश्रय लेकर अपने मन और आत्मा पर संयम कर तुम सभी कर्मों के फलों को छोड़ दो (त्याग कर दो) ।

 श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।  ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥१२- १२॥ 

अभ्यास से बढकर ज्ञान (समझ आ जाना) है, ज्ञान (समझ) से बढकर ध्यान है । और ध्यान से भी उत्तम कर्ण के फल का त्याग है, क्योंकि ऍसा करते ही तुरन्त शान्ति प्राप्त होती है ।

 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।  निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥१२- १३॥ 

जो सभी जीवों के प्रति द्वेष-हीन है, मैत्री (मित्र भाव) है, करुणशाल है । जो 'मैं और मेरे' के विचारों से मुक्त है, अहंकार रहित है, सुख और दुखः को एक सा देखता है, जो क्षमी है ।

 संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।  मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२- १४॥ 

जो योगी सदा संतुष्ट है, जिसका अपने आत्म पर काबू है, जो दृढ निश्चय है । जो मन और बुद्धि से मुझे अर्पित है, ऍसा मनुष्य, मेरा भक्त, मुझे प्रिय है ।

 यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।  हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥१२- १५॥ 

जिससे लोग उद्विचित (व्याकुल, परेशान) नहीं होते (अर्थात जो किसी को परेशान नहीं करता, उद्विग्न नहीं देता), और जो स्वयं भी लोगों से उद्विजित नहीं होता, जो हर्ष, ईर्षा, भय, उद्वेग से मुक्त है, ऍसा मनुष्य मुझे प्रिय है ।

 अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।  सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥१२- १६॥ 

जो आकाङ्क्षा रहित है, शुद्ध है, दक्ष है, उदासीन (मतलब रहित) है, व्यथा रहित है, सभी आरम्भों का त्यागी है, ऍसा मेरी भक्त मुझे प्रिय है ।

 यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।  शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१२- १७॥ 

जो न प्रसन्न होता है, न दुखी (द्वेष) होता है, न शोक करता है और न ही आकाङ्क्षा करता है । शुभ और अशुभ दोनों का जिसने त्याग कर दिया है, ऍसा भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है ।

 समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।  शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥१२- १८॥ 

जो शत्रु और मित्र के प्रति समान है, तथा मान और अपमान में भी एक सा है, जिसके लिये सरदी गरमी एक हैं, और जो सुख और दुख में एक सा है, हर प्रकार से संग रहित है ।

 तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।  अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१२- १९॥ 

जो अपनी निन्दा और स्तुति को एक सा भाव देता है (एक सा मानता है), जो मौनी है, किसी भी तरह (थोड़े बहुत में) संतुष्ट है, घर बार से जुड़ा नहीं है । जो स्थिर मति है, ऍसा भक्तिमान नर मुझे प्रिय है ।

 ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।  श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥१२- २०॥ 

और जो श्रद्धावान भक्त मुझ ही पर परायण (मुझे ही लक्ष्य मानते) हुये, इस बताये गये धर्म अमृत की उपासना करते हैं (मानते हैं और पालन करते हैं), ऍसे भक्त मुझे अत्यन्त (अतीव) प्रिय हैं ।

।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ।।


 तेरहँवां अध्याय

श्रीभगवानुवाच

 इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।  एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१३- १॥ 

इस शरीर को, हे कौन्तेय, क्षेत्र कहा जाता है । और ज्ञानी लोग इस क्षेत्र को जो जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं ।

 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।  क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥१३- २॥ 

सभी क्षोत्रों में तुम मुझे ही क्षेत्रज्ञ जानो हे भारत (सभी शरीरों में मैं क्षेत्रज्ञ हूँ) । इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान (समझ) ही वास्तव में ज्ञान है, मेरे मत से ।

 तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।  स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥१३- ३॥ 

वह क्षेत्र जो है और जैसा है, और उसके जो विकार (बदलाव) हैं, और जिस से वो उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ जो है, और जो इसका प्रभाव है, वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो ।

 ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।  ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३- ४॥ 

ऋषियों ने बहुत से गीतों में और विविध छन्दों में पृथक पृथक रुप से इन का वर्णन किया है । तथा सोच समझ कर संपूर्ण तरह निश्चित कर के ब्रह्म सूत्र के पदों में भी इसे बताया गया है ।

 महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।  इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥१३- ५॥ 

महाभूत (मूल प्राकृति), अहंकार (मैं का अहसास), बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति (गुण), दस इन्द्रियाँ (पाँच इन्द्रियां और मन और कर्म अंग), और पाँचों इन्द्रियों के विषय ।

 इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।  एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥१३- ६॥ 

इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघ (देह समूह), चेतना, धृति (स्थिरता) - यह संक्षेप में क्षेत्र और उसके विकार बताये गये हैं ।

 अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।  आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥१३- ७॥ 

अभिमान न होना (स्वयं के मान की इच्छा न रखना), झुठी दिखावट न करना, अहिंसा (जीवों की हिंसा न करना), शान्ति, सरलता, आचार्य की उपासना करना, शुद्धता (शौच), स्थिरता और आत्म संयम ।

 इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।  जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३- ८॥ 

इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य (इच्छा शून्यता), अहंकार का अभाव, जन्म मृत्यु जरा (बुढापे) और बिमारी (व्याधि) के रुप में जो दुख दोष है उसे ध्यान में रखना (अर्थात इन से मुक्त होने का प्रयत्न करना) ।

 असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।  नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३- ९॥ 

आसक्ति से मुक्त रहना (संग रहित रहना), पुत्र, पत्नी और गृह आदि को स्वयं से जुड़ा न देखना (ऐकात्मता का भाव न होना), इष्ट (प्रिय) और अनिष्ट (अप्रिय) का प्राप्ति में चित्त का सदा एक सा रहना ।

 मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।  विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१३- १०॥ 

मुझ में अनन्य अव्यभिचारिणी (स्थिर) भक्ति होना, एकान्त स्थान पर रहने का स्वभाव होना, और लोगों से घिरे होने को पसंद न करना ।

 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।  एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३- ११॥ 

सदा अध्यात्म ज्ञान में लगे रहना, तत्त्व (सार) का ज्ञान होना, और अपनी भलाई (अर्थ अर्थात भगवात् प्राप्ति जिसे परमार्थ - परम अर्थ कहा जाता है) को देखना, इस सब को ज्ञान कहा गया है, और बाकी सब अज्ञान है ।

 ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।  अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१३- १२॥ 

जो ज्ञेय है (जिसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये), मैं उसका वर्णन करता हूँ, जिसे जान कर मनुष्य अमरता को प्राप्त होता है । वह (ज्ञेय) अनादि है (उसका कोई जन्म नहीं है), परम ब्रह्म है । न उसे सत कहा जाता है, न असत् कहा जाता है (वह इन संज्ञाओं से परे है) ।

 सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।  सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३- १३॥ 

हर ओर हर जगह उसके हाथ और पैर हैं, हर ओर हर जगह उसके आँखें और सिर तथा मुख हैं, हर जगह उसके कान हैं । वह इस संपूर्ण संसार को ढक कर (हर जगह व्याप्त हो) विराजमान है ।

 सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।  असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३- १४॥ 

वह सभी इन्द्रियों से वर्जित होते हुये सभी इन्द्रियों और गुणों को आभास करता है । वह असक्त होते हुये भी सभी का भरण पोषण करता है । निर्गुण होते हुये भी सभी गुणों को भोक्ता है ।

  बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।  सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१३- १५॥ 

वह सभी चर और अचर प्राणियों के बाहर भी है और अन्दर भी । सूक्षम होने के कारण उसे देखा नहीं जा सकता । वह दुर भी स्थित है और पास भी ।

 अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।  भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१३- १६॥ 

सभी भूतों (प्राणियों) में एक ही होते हुये भी (अविभक्त होते हुये भी) विभक्त सा स्थित है । वहीं सभी प्राणियों का पालन पोषण करने वाला है, वहीं ज्ञेयं (जिसे जाना जाना चाहिये) है, ग्रसिष्णु है, प्रभविष्णु है ।

 ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।  ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥१३- १७॥ 

सभी ज्योतियों की वही ज्योति है । उसे तमसः (अन्धकार) से परे (परम) कहा जाता है । वही ज्ञान है, वहीं ज्ञेय है, ज्ञान द्वारा उसे प्राप्त किया जाता है । वही सब के हृदयों में विराजमान है ।

 इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।  मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१३- १८॥ 

इस प्रकार तुम्हें संक्षेप में क्षेत्र (यह शरीर आदि), ज्ञान और ज्ञेय (भगवान) का वर्णन किया है । मेरा भक्त इन को समझ जाने पर मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है ।

 प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।  विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥१३- १९॥ 

तुम प्रकृति और पुरुष दोनो की ही अनादि (जन्म रहित) जानो । और विकारों और गुणों को तुम प्रकृति से उत्पन्न हुआ जानो ।

 कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।  पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३- २०॥ 

कार्य के साधन और कर्ता होने की भावना में प्रकृति को कारण बताया जाता है । और सुख दुख के भोक्ता होने में पुरुष को उसका कारण कहा जाता है ।

 पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‌क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।  कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥१३- २१॥ 

यह पुरुष (आत्मा) प्रकृति में स्थित हो कर प्रकृति से ही उत्पन्न हुये गुणों को भोक्ता है । इन गुणों से संग (जुडा होना) ही पुरुष का सद और असद योनियों में जन्म का कारण है ।

 उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।  परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥१३- २२॥ 

यह पुरुष (जीव आत्मा) इस देह में स्थित होकर देह के साथ संग करता है इसलिये इसे उपद्रष्टा कहा जाता है, अनुमति देता है इसलिये इसे अनुमन्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का पालन पोषण करने वाला समझने के कारण इसे भर्ता कहा जा सकता है, और देह को भोगने के कारण भोक्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का स्वामि समझने के कारण महेष्वर कहा जा सकता है । लेकिन स्वरूप से यह परमात्मा तत्व ही है अर्थात इस का देह से कोई संबंध नहीं ।

 य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।  सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥१३- २३॥ 

जो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति तथा प्रकृति में स्थित गुणों के भेद को जानता है, वह मनुष्य सदा वर्तता हुआ भी दोबारा फिर मोहित नहीं होता ।

 ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।  अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥१३- २४॥ 

कोई ध्यान द्वारा अपने ही आत्मन से अपनी आत्मा को देखते हैं, अन्य सांख्य ज्ञान द्वारा अपनी आत्मा का ज्ञान प्राप्त करते हैं, तथा अन्य कई कर्म योग द्वारा ।

 अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।  तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥१३- २५॥ 

लेकिन दूसरे कई इसे न जानते हुये भी जैसा सुना है उस पर विश्वास कर, बताये हुये की उपासना करते हैं । वे श्रुति परायण (सुने हुये पर विश्वास करते और उसका सहारा लेते) लोग भी इस मृत्यु संसार को पार कर जाते हैं ।

 यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।  क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥१३- २६॥ 

हे भरतर्षभ, जो भी स्थावर यां चलने-फिरने वाले जीव उत्पन्न होते हैं, तुम उन्हें इस क्षेत्र (शरीर तथा उसके विकार आदि) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से ही उत्पन्न हुआ समझो ।

 समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।  विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३- २७॥ 

परमात्मा सभी जीवों में एक से स्थित हैं । विनाश को प्राप्त होते इन जीवों में जो अविनाशी उन परमात्मा को देखता है, वही वास्तव में देखता है ।

 समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।  न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३- २८॥ 

हर जगह इश्वर को एक सा अवस्थित देखता हुआ जो मनुष्य सर्वत्र समता से देखता है, वह अपने ही आत्मन द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परम पति को प्राप्त करता है ।

 प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।  यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३- २९॥ 

जो प्रकृति को ही हर प्रकार से सभी कर्म करते हुये देखता है, और स्वयं को अकर्ता (कर्म न करने वाला) जानता है, वही वास्तव में सत्य देखता है ।

 यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।  तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥१३- ३०॥ 

जब वह इन सभी जीवों के विविध भावों को एक ही जगह स्थित देखता है (प्रकृति में) और उसी एक कारण से यह सारा विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

 अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।  शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३- ३१॥ 

हे कौन्तेय, जीवात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण विकारहीन (अव्यय) परमात्मा तत्व ही है । यह शरीर में स्थित होते हुये भी न कुछ करती है और न ही लिपती है ।

 यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।  सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥१३- ३२॥ 

जैसे हर जगह फैला आकाश सूक्षम होने के कारण लिपता नहीं है उसी प्रकार हर जगह अवस्थित आत्मा भी देह से लिपती नहीं है ।

 यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।  क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३- ३३॥ 

जैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार हे भारत, क्षेत्री (आत्मा) भी क्षेत्र को प्रकाशित कर देती है ।

 क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।  भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥१३- ३४॥ 

इस पर्कार जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच में ज्ञान दृष्टि से भेद देखते हैं और उन को अलग अलग जानते हैं, वे इस प्रकृति से विमुक्त हो परम गति को प्राप्त करते हैं ।


।। ॐ नमः भगवते वासेदुवाय ।।



 चौदहवाँ अध्याय

श्री भगवान बोले:

 परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।  यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४- १॥ 

हे अर्जुन, मैं फिर से तुम्हें वह बताता हूँ जो सभी ज्ञानों में से उत्तम ज्ञान है । इसे जान कर सभी मुनी परम सिद्धि को प्राप्त हुये हैं ।

 इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।  सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४- २॥ 

इस ज्ञान का आश्रय ले जो मेरी स्थित को प्राप्त कर चुके हैं, वे सर्ग के समय फिर जन्म नहीं लेते, और न ही प्रलय में व्यथित होते हैं ।

 मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।  संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४- ३॥ 

हे भारत, यह महद् ब्रह्म (मूल प्रकृति) योनि है, और मैं उसमें गर्भ देता हूँ । इस से ही सभी जीवों का जन्म होता है हे भारत ।

 सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।  तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४- ४॥ 

हे कौन्तेय, सभी योनियों में जो भी जीव पैदा होते हैं, उनकी महद् ब्रह्म तो योनि है (कोख है), और मैं बीज देने वाला पिता हूँ ।

 सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।  निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४- ५॥ 

हे माहाबाहो, सत्त्व, रज और तम - प्रकृति से उत्पन्न होने वाले यह तीन गुण अविकारी अव्यय आत्मा को देह में बाँधते हैं ।

 तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।  सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४- ६॥ 

हे आनघ (पापरहित), उन में से सत्त्व निर्मल और प्रकाशमयी, पीडा रहित होने के कारण सुख के संग और ज्ञान द्वारा आत्मा को बाँधता है ।

 रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।  तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४- ७॥ 

तृष्णा (भूख, इच्छा) और आसक्ति से उत्पन्न रजो गुण को तुम रागात्मक जानो । यह देहि (आत्मा) को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है, हे कौन्तेय ।

 तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।  प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४- ८॥ 

तम को लेकिन तुम अज्ञान से उत्पन्न हुआ जानो जो सभी देहवासीयों को मोहित करता है । हे भारत, वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा आत्मा को बाँधता है ।

 सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।  ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥१४- ९॥ 

सत्त्व सुख को जन्म देता है, रजो गुण कर्मों (कार्यों) को, हे भारत । लेकिन तम गुण ज्ञान को ढक कर प्रमाद (अज्ञानता, मुर्खता) को जन्म देता है ।

 रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।  रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४- १०॥ 

हे भारत, रजो गुण और तमो गुण को दबा कर सत्त्व बढता है, सत्त्व और तमो गुण को दबा कर रजो गुण बढता है, और रजो और सत्त्व को दबाकर तमो गुण बढता है ।

 सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।  ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥१४- ११॥ 

जब देह के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है और ज्ञान बढता है, तो जानना चाहिये की सत्त्व गुण बढा हुआ है ।

 लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।  रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४- १२॥ 

हे भरतर्षभ, जब रजो गुण की वृद्धि होती है तो लोभ प्रवृत्ति और उद्वेग से कर्मों का आरम्भ, स्पृहा (अशान्ति) होते हैं ।

 अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।  तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४- १३॥ 

हे कुरुनन्दन । तमो गुण के बढने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति (न करने की इच्छा), प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं ।

 यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।  तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४- १४॥ 

जब देहभृत सत्त्व के बढे होते हुये मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञानमंद लोगों के अमल (स्वच्छ) लोकों को जाता है ।

 रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।  तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१४- १५॥ 

रजो गुण की बढोती में जब जीव मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह कर्मों से आसक्त जीवों के बीच जन्म लेता है । तथा तमो गुण की वृद्धि में जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह मूढ योनियों में जन्म लेता है ।

 कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।  रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४- १६॥ 

सात्विक (सत्त्व गुण में आधारित) अच्छे कर्मों का फल भी निर्मल बताया जाता है, राजसिक कर्मों का फल लेकिन दुख ही कहा जाता है, और तामसिक कर्मों का फल अज्ञान ही है ।

 सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।  प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥१४- १७॥ 

सत्त्व ज्ञान को जन्म देता है, रजो गुण लोभ को । तमो गुण प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न करता है ।

 ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।  जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४- १८॥ 

सत्त्व में स्थित प्राणि ऊपर उठते हैं, रजो गुण में स्थित लोग मध्य में ही रहते हैं (अर्थात न उनका पतन होता है न उन्नति), लेकिन तामसिक जघन्य गुण की वृत्ति में स्थित होने के कारण (निंदनीय तमो गुण में स्थित होने के कारण) नीचें को गिरते हैं (उनका पतन होता है) ।

 नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।  गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४- १९॥ 

जब मनुष्य गुणों के अतिरिक्त और किसी को भी कर्ता नहीं देखता समझता (स्वयं और दूसरों को भी अकर्ता देखता है), केवल गुणों को ही गर्ता देखता है, और स्वयं को गुणों से ऊपर (परे) जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त करता है ।

 गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।  जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥१४- २०॥ 

इन तीनों गुणों को, जो देह की उत्पत्ति का कारण हैं, लाँघ कर देही अर्थात आत्मा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दुखों से विमुक्त हो अमृत का अनुभव करता है ।


अर्जुन जी बोले:

 कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।  किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥१४- २१॥ 

हे प्रभो, इन तीनो गुणों से अतीत हुये मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं । उस का क्या आचरण होता है । वह तीनों गुणो से कैसे पार होता है ।

श्रीभगवान बोले:

 प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।  न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥१४- २२॥ 

हे पाण्डव, तानों गुणों से ऊपर उठा महात्मा न प्रकाश (ज्ञान), न प्रवृत्ति (रजो गुण), न ही मोह (तमो गुण) के बहुत बढने पर उन से द्वेष करता है और न ही लोप हो जाने पर उन की इच्छा करता है ।

 उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।  गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥१४- २३॥ 

जो इस धारणा में स्थित रहता है की गुण ही आपस में वर्त रहे हैं, और इसलिये उदासीन (जिसे कोई मतलब न हो) की तरह गुणों से विचलित न होता, न ही उन से कोई चेष्ठा करता है ।

 समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।  तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥१४- २४॥ 

सुख और दुख में एक सा, अपने आप में ही स्थित जो मिट्टि, पत्थर और सोने को एक सा देखता है । जो प्रिय और अप्रिय की एक सी तुलना करता है, जो धीर मनुष्य निंदा और आत्म संस्तुति (प्रशंसा) को एक सा देखता है ।

 मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।  सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥१४- २५॥ 

जो मान और अपमान को एक सा ही तोलता है (बराबर समझता है), मित्र और विपक्षी को भी बराबर देखता है । सभी आरम्भों का त्याग करने वाला है, ऐसे महात्मा को गुणातीत (गुणों के अतीत) कहा जाता है ।


 मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।  स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१४- २६॥ 

और जो मेरी अव्यभिचारी भक्ति करता है, वह इन गुणों को लाँघ कर ब्रह्म की प्राप्ति करने का पात्र हो जाता है ।

 ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।  शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥१४- २७॥ 

क्योंकि मैं ही ब्रह्म का, अमृतता का (अमरता का), अव्ययता का, शाश्वतता का, धर्म का, सुख का और एकान्तिक सिद्धि का आधार हूँ (वे मुझ में ही स्थापित हैं) ।


।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ।।



पंद्रहवाँ अध्याय

श्रीभगवान बोले

 ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।  छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१५- १॥ 

अश्वत्थ नाम वृक्ष जिसे अव्यय बताया जाता है, जिसकी जडें ऊपर हैं और शाखायें नीचे हैं, वेद छन्द जिसके पत्ते हैं, जो उसे जानता है वह वेदों का ज्ञाता है ।

 अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।  अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥१५- २॥ 

उस वृक्ष की गुणों और विषयों द्वारा सिंचीं शाखाएं नीचे ऊपर हर ओर फैली हुईं हैं । उसकी जडें भी मनुष्य के कर्मों द्वारा मनुष्य को हर ओर से बाँधे नीचे उपर बढी हुईं हैं ।

 न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।  अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥१५- ३॥ 

न इसका वास्तविक रुप दिखता है, न इस का अन्त और न ही इस का आदि और न ही इस का मूल स्थान (जहां यह स्थापित है) । इस अश्वथ नामक वृक्ष की बहुत धृढ शाखाओं को असंग रूपी धृढ शस्त्र से काट कर -।


 ततः पदं तत्परिमार्गितव्यंयस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।  तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येयतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥१५- ४॥ 

उसके बाद परम पद की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर चले जाने के बाद मनुष्य फिर लौट कर नहीं आता । उसी आदि पुरुष की शरण में चले जाना चाहिये जिन से यह पुरातन वृक्ष रूपी संसार उत्पन्न हुआ है ।


 निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।  द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥१५- ५॥ 

मान और मोह से मुक्त, संग रूपी दोष पर जीत प्राप्त किये, नित्य अध्यात्म में लगे, कामनाओं को शान्त किये, सुख दुख जिसे कहा जाता है उस द्वन्द्व से मुक्त हुये, ऐसे मूर्खता हीन महात्मा जन उस परम अव्यय पद को प्राप्त करते हैं ।


 न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।  यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥१५- ६॥ 

न उस पद को सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्र और न ही अग्नि (वह पद इस सभी लक्षणों से परे है), जहां पहुँचने पर वे पुनः वापिस नहीं आते, वही मेरा परम धाम (स्थान) है ।

 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।  मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥१५- ७॥ 

मेरा ही सनातन अंश इस जीव लोक में जीव रूप धारण कर, मन सहित छे इन्द्रियों (मन और पाँच अन्य इन्द्रियों) को, जो प्रकृति में स्थित हैं, आकर्षित करता है ।

 शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।  गृहित्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥१५- ८॥ 

जैसे वायु गन्ध को ग्रहण कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है, उसी प्रकार आत्मा इन इन्द्रियों को ग्रहण कर जिस भी शरीर को प्राप्त करता है वहां ले जाता है ।

 श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।  अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥१५- ९॥ 

शरीर में स्थित हो वह सुनने की शक्ति, आँखें, छूना, स्वाद, सूँघने की शक्ति तथा मन द्वारा इन सभी के विषयों का सेवन करता है ।

 उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।  विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥१५- १०॥ 

शरीर को त्यागते हुये, या उस में स्थित रहते हुये, गुणों को भोगते हुये, जो विमूढ (मूर्ख) हैं वे उसे (आत्मा) को नहीं देख पाते, परन्तु जिनके पास ज्ञान चक्षु (आँखें) हैं, अर्थात जो ज्ञान युक्त हैं, वे उसे देखते हैं ।

 यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।  यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥१५- ११॥ 

साधना युक्त योगी जन इसे स्वयं में अवस्थित देखते हैं (अर्थात अपनी आत्मा का अनुभव करते हैं), परन्तु साधना करते हुये भी अकृत जन, जिनका चित अभी ज्ञान युक्त नहीं है, वे इसे नहीं देख पाते ।

 यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।  यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१५- १२॥ 

जो तेज सूर्य से आकर इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, और जो तेज चन्द्र औऱ अग्नि में है, उन सभी को तुम मेरा ही जानो ।

 गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।  पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१५- १३॥ 

मैं ही सभी प्राणियों में प्रविष्ट होकर उन्हें धारण करता हूँ (उनका पालन पोषण करता हूँ) । मैं ही रसमय चन्द्र बनकर सभी औषधीयाँ (अनाज आदि) उत्पन्न करता हूँ ।

 अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।  प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१५- १४॥ 

मैं ही प्राणियों की देह में स्थित हो प्राण और अपान वायुओं द्वारा चारों प्रकार के खानों को पचाता हूँ ।

 सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।  वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५- १५॥ 

मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ । मुझ से ही स्मृति, ज्ञान होते है । सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ । मैं ही वेदों का सार हुँ और मैं ही वेदों का ज्ञाता हुँ ।

 द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।  क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१५- १६॥ 

इस संसार में दो प्रकार की पुरुष संज्ञायें हैं - क्षर और अक्षऱ (अर्थात जो नश्वर हैं और जो शाश्वत हैं) । इन दोनो प्रकारों में सभी जीव (देहधारी) क्षर हैं और उन देहों में विराजमान आत्मा को अक्षर कहा जाता है ।

 उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।  यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१५- १७॥ 

परन्तु इन से अतिरिक्त एक अन्य उत्तम पुरुष और भी हैं जिन्हें परमात्मा कह कर पुकारा जाता है । वे विकार हीन अव्यय ईश्वर इन तीनो लोकों में प्रविष्ट होकर संपूर्ण संसार का भरण पोषण करते हैं ।

 यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।  अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१५- १८॥ 

क्योंकि मैं क्षर (देह धारी जीव) से ऊपर हूँ तथा अक्षर (आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इस लिये मुझे इस संसार में पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है ।

 यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।  स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१५- १९॥ 

जो अन्धकार से परे मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह ही सब कुछ जानता है और संपूर्ण भावना से हर प्रकार मुझे भजता है, हे भारत ।

 इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।  एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥१५- २०॥ 

हे अनघ (पाप हीन अर्जुन), इस प्रकार मैंने तुम्हें इस गुह्य शास्त्र को सुनाया । इसे जान लेने पर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है, हे भारत ।

।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ।।





 सोल्हवाँ अध्याय

श्री भगवान बोले:

 अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।  दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥१६- १॥ 

अभय, सत्त्व संशुद्धि, ज्ञान और कर्म योग में स्थिरता, दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ (जैसे प्राणायाम, जप यज्ञ, द्रव्य यज्ञ आदि), स्वध्याय, तपस्या, सरलता ।

 अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।  दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥१६- २॥ 

अहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना), सत्य, क्रोध न करना, त्याग, मन में शान्ति होना (द्वेष आदि न रखना), सभी जीवों पर दया, संसारिक विषयों की तरफ उदासीनता, अन्त करण में कोमलता, अकर्तव्य करने में लज्जा ।

 तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।  भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥१६- ३॥ 

तेज, क्षमा, धृति (स्थिरता), शौच (सफाई और शुद्धता), अद्रोह (द्रोह - वैर की भावना न रखना), मान की इच्छा न रखना - हे भारत, यह दैवी प्रकृति में उत्पन्न मनुष्य के लक्षण होते हैं ।

 दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।  अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥१६- ४॥ 

दम्भ (क्रोध अभिमान), दर्प (घमन्ड), क्रोध, कठोरता और अपने बल का दिखावा करना, तथा अज्ञान - यह असुर प्राकृति को प्राप्त मनुष्य के लक्षण होते हैं ।

 दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।  मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥१६- ५॥ 

दैवी प्रकृति विमोक्ष में सहायक बनती है, परन्तु आसुरी बुद्धि और ज्यादा बन्धन का कारण बनती है । तुम दुखी मत हो क्योंकि तुम दैवी संपदा को प्राप्त हो हे अर्जुन ।

 द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।  दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥१६- ६॥ 

इस संसार में दो प्रकार के जीव हैं - दैवी प्रकृति वाले और आसुरी प्रकृति वाले । दैवी स्वभाव के बारे में अब तक विस्तार से बताया है । अब आसुरी बुद्धि के विषय में सुनो हे पार्थ ।

 प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।  न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥१६- ७॥ 

असुर बुद्धि वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते (अर्थात किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये किस से निवृत्त होना चाहिये, उन्हें इसका आभास नहीं) । न उनमें शौच (शुद्धता) होता है, न ही सही आचरण, और न ही सत्य ।

 असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।  अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥१६- ८॥ 

उनके अनुसार यह संसार असत्य और प्रतिष्ठा हीन है (अर्थात इस संसार में कोई दिखाई देने वाले से बढकर सत्य नहीं है और न ही इसका कोई मूल स्थान है) , न ही उनके अनुसार इस संसार में कोई ईश्वर हैं, केवल परस्पर (स्त्रि पुरुष के) संयोग से ही यह संसार उत्पन्न हुआ है, केवल काम भाव ही इस संसार का कारण है ।

 एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।  प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥१६- ९॥ 

इस दृष्टि से इस संसार को देखते, ऐसे अल्प बुद्धि मनुष्य अपना नाश कर बैठते हैं और उग्र कर्मों में प्रवृत्त होकर इस संसार के अहित के लिये ही प्रयत्न करते हैं ।

 काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।  मोहाद्‌गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१६- १०॥ 

दुर्लभ (असंभव) इच्छाओं का आश्रय लिये, दम्भ (घमन्ड) मान और अपने ही मद में चुर हुये, मोहवश (अज्ञान वश) असद आग्रहों को पकड कर अपवित्र (अशुचि) व्रतों में जुटते हैं ।

 चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।  कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥१६- ११॥ 

मृत्यु तक समाप्त न होने वालीं अपार चिन्ताओं से घिरे, वे काम उपभोग को ही परम मानते हैं ।

 आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।  ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥१६- १२॥ 

सैंकडों आशाओं के जाल में बंधे, इच्छाओं और क्रोध में डूबे, वे अपनी इच्छाओं और भोगों के लिये अन्याय से कमाये धन के संचय में लगते हैं ।

 इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।  इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥१६- १३॥ 

'इसे तो हमने आज प्राप्त कर लिया है, अन्य मनोरथ को भी हम प्राप्त कर लेंगें । इतना हमारे पास है, उस धन भी भविष्य में हमारा हो जायेगा' ।

 असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।  ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥१६- १४॥ 

'इस शत्रु तो हमारे द्वारा मर चुका है, दूसरों को भी हम मार डालेंगें । मैं ईश्वर हूँ (मालिक हूँ), मैं सुख सम्रद्धि का भोगी हूँ, सिद्ध हुँ, बलवान हुँ, सुखी हुँ ' ।

 आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।  यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥१६- १५॥ 

'मेरे समान दूसरा कौन है । हम यज्ञ करेंगें, दान देंगें और मजा उठायेंगें ' - इस प्रकार वे अज्ञान से विमोहित होते हैं ।

 अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।  प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६- १६॥ 

उनका चित्त अनेकों दिशाओं में दौडता हुआ, अज्ञान के जाल से ढका रहता है । इच्छाओं और भोगों से आसक्त चित्त, वे अपवित्र नरक में गिरते जाते हैं ।

 आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।  यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥१६- १७॥ 

अपने ही घमन्ड में डूबे, सवयं से सुध बुध खोये, धन और मान से चिपके, वे केवन ऊपर ऊपर से ही (नाम के लिये ही) दम्भ और घमन्ड में डूबे अविधि पूर्ण ढंग से यज्ञ करते हैं ।

 अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।  मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१६- १८॥ 

अहंकार, बल, घमन्ड, काम और क्रोध में डूबे वे सवयं की आत्मा और अन्य जीवों में विराजमान मुझ से द्वेष करते हैं और मुझ में दोष ढूँडते हैं ।

 तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान् ।  क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥१६- १९॥ 

उन द्वेष करने वाले क्रूर, इस संसार में सबसे नीच मनुष्यों को मैं पुनः पुनः असुरी योनियों में ही फेंकता हुँ ।

 आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।  मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥१६- २०॥ 

उन आसुरी योनियों को प्राप्त कर, जन्मों ही जन्मों तक वे मूर्ख मुझे प्राप्त न कर, हे कौन्तेय, फिर और नीच गतियों को (योनियों अथवा नरकों) को प्राप्त करते हैं ।

 त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।  कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥१६- २१॥ 

नरक के तीन द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं - काम (इच्छा), क्रोध, तथा लोभ । इसलिये, इन तीनों का ही त्याग कर देना चाहिये ।

 एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।  आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥१६- २२॥ 

इन तीनों अज्ञान के द्वारों से विमुक्त होकर मनुष्य अपने श्रेय (भले) के लिये आचरण करता है, और फिर परम गति को प्राप्त होता है ।

 यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।  न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥१६- २३॥ 

जो शास्त्र में बताये मार्ग को छोड कर, अपनी इच्छा अनुसार आचरण करता है, न वह सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न ही परम गति ।

 तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।  ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥१६- २४॥ 

इसलिये तुम्हारे लिये शास्त्र प्रमाण रूप है (शास्त्र को प्रमाण मानकर) जिससे तुम जान सकते हो की क्या करने योग्य है और क्या नहीं करने योग्य है । शास्त्र द्वारा मार्ग को जान कर हि तुम्हें उसके अनुसार कर्म करना चाहिये ।


।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ।।




सतारँहवा अध्याय

अर्जुन बोले:

 ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।  तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१७- १॥ 

हे कृष्ण । जो लोग शास्त्र में बताई विधि की चिंता न कर, अपनी श्रद्धा अनुसार यजन (यज्ञ) करते हैं, उन की निष्ठा कैसी ही - सातविक, राजसिक अथवा तामसिक ।

श्री भगवान बोले:

 त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।  सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥१७- २॥ 

हे अर्जुन । देहधारियों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक । इस बारे में मुझ से सुनो ।

 सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।  श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥१७- ३॥ 

हे भारत, सब की श्रद्धा उन के अन्तःकरण के अनुसार ही होती है । जिस पुरुष की जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही वह स्वयं भी होता है ।

 यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।  प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥१७- ४॥ 

सातविक जन देवताओं को यजते हैं । राजसिक लोग यक्ष औऱ राक्षसों का अनुसरण करते हैं । तथा तामसिक लोग भूत प्रेतों की यजना करते हैं ।

 अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।  दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥१७- ५॥  कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।  मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥१७- ६॥ 

जो लोग शास्त्रों में नहीं बताये घोर तप करते हैं, ऐसे दम्भ, अहंकार, काम, राग औऱ बल से चूर अज्ञानी (बुद्धि हीन) मनुष्य इस शरीर में स्थित पाँचों तत्वों को कर्षित करते हैं, साथ में मुझे भी जो उन के शरीर में स्थित हुँ । ऐसे मनुष्यों को तुम आसुरी निश्चय (असुर वृ्त्ति) वाले जानो ।


 आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।  यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥१७- ७॥ 

प्राणियों को जो आहार प्रिय होता है वह भी तीन प्रकार का होता है । वैसे ही यज्ञ, तप तथा दानसभी - ये सभी भी तीन प्रकार के होते हैं । इन का भेद तुम मुझ से सुनो ।

 आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।  रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥१७- ८॥ 

जो आहार आयु बढाने वाला, बल तथा तेज में वृद्धि करने वाला, आरोग्य प्रदान करने वाला, सुख तथा प्रीति बढाने वाला, रसमयी, स्निग्ध (कोमल आदि), हृदय की स्थिरता बढाने वाला होता है - ऐसा आहार सातविक लोगों को प्रिय होता है ।

 कट्‌वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।  आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥१७- ९॥ 

कटु (कडवा), खट्टा, ज्यादा नमकीन, अति तीक्षण (तीखा), रूखा या कष्ट देने वाला - ऐसा आहार जो दुख, शोक और राग उत्पन्न करने वाला है वह राजसिक मनुष्यों को भाता है ।

 यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।  उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१७- १०॥ 

जो आहार आधा पका हो, रस रहित हो गया हो, बासा, दुर्गन्धित, गन्दा या अपवित्र हो - वैसा तामसिक जनों को प्रिय लगता है ।

 अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।  यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥१७- ११॥ 

जो यज्ञ फल की कामना किये बिना, यज्ञ विधि अनुसार किया जाये, यज्ञ करना कर्तव्य है - मन में यह बिठा कर किया जाये वह सात्त्विक है ।

 अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।  इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥१७- १२॥ 

जो यज्ञ फल की कामना से, और दम्भ (दिखावे आदि) के लिये किया जाये, हे भारत श्रेष्ठ, ऐसे यज्ञ को तुम राजसिक जानो ।


 विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।  श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥१७- १३॥ 

जो यज्ञ विधि हीन ढंग से किया जाये, अन्न दान रहित हो, मन्त्रहीन हो, जिसमें कोई दक्षिणा न हो, श्रद्धा रहित हो - ऐसे यज्ञ को तामसिक यज्ञ कहा जाता है ।

 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।  ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥१७- १४॥ 

देवताओं, ब्राह्मण, गुरु और बुद्धिमान ज्ञानी लोगों की पूजा, शौच (सफाई, पवित्रता), सरलता, ब्रह्मचार्य, अहिंसा - यह सब शरीर की तपस्या बताये जाते हैं ।

 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।  स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥१७- १५॥ 

उद्वेग न पहुँचाने वाले सत्य वाक्य जो सुनने में प्रिय और हितकारी हों - ऐसे वाक्य बोलना, शास्त्रों का स्वध्याय तथा अभ्यास ये वाणी की तपस्या बताये जाते है ।

 मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।  भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥१७- १६॥ 

मन में शान्ति (से उत्पन्न हुई प्रसन्नता), सौम्यता, मौन, आत्म संयम, भावों (अन्तःकरण) की शुद्धि - ये सब मन की तपस्या बताये जाते हैं ।

 श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।  अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥१७- १७॥ 

मनुष्य जिस श्रद्धा से तपस्य करता है, वह भी तीन प्रकार की है । सातविक तपस्या वह है जो फल की कामना से मुक्त होकर की जाती है ।

 सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।  क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१७- १८॥ 

जो तपस्या सत्कार, मान तथा पूजे जाने के लिये की जाती है, या दिखावे अथवा पाखण्ड से की जाती है, ऐसी अस्थिर और अध्रुव (जिस का असतित्व स्थिर न हो) तपस्या को राजसिक कहा जाता है ।

 मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।  परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७- १९॥ 

वह तप जो मूर्ख आग्रह कारण (गलत धारणा के कारण) और स्वयं को पीडा पहुँचाने वाला अथवा दूसरों को कष्ट पहुँचाने हेतु किया जाये, ऐसा तप तामसिक कहा जाता है ।

 दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।  देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥१७- २०॥ 

जो दान यह मान कर दिया जाये की दान देना कर्तव्य है, न कि उपकार करने के लिये, और सही स्थान पर, सही समय पर उचित पात्र (जिसे दान देना चाहिये) को दिया जाये, उस दान को सात्विक दान कहा जाता है ।

 यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।  दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥१७- २१॥ 

जो दान उपकार हेतु, या पुनः फल की कामना से दिया जाये, या कष्ट भरे मन से दिया जाये उसे राजसिक कहा जाता है ।

 अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।  असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७- २२॥ 

परन्तु जो दान गलत स्थान पर या गलत समय पर, अनुचित पात्र को दिया जाये, या बिना सत्कार अथवा तिरस्कार के दिया जाये, उसे तामसिक दान कहा जायेगा ।

 ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।  ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥१७- २३॥ 

ॐ तत सत् - इस प्रकार ब्रह्म का तीन प्रकार का निर्देश कहा गया है । उसी से पुरातन काल में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों का विधान हुआ है ।

 तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।  प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥१७- २४॥ 

इसलिये ब्रह्मवादि शास्त्रों में बताई विधि द्वारा सदा ॐ के उच्चारण द्वारा यज्ञ, दान और तप क्रियायें आरम्भ करते हैं ।

 तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।  दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥१७- २५॥ 

और मोक्ष की कामना करने वाले मनुष्य "तत" कह कर फल की इच्छा त्याग कर यज्ञ, तप औऱ दान क्रियायें करते हैं । (तत अर्थात वह)

 सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।  प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥१७- २६॥ 

हे पार्थ, सद-भाव (सत भाव) तथा साधु भाव में सत शब्द का प्रयोग किया जाता है । उसी प्रकार प्रशंसनीय कार्य में भी 'सत' शब्द प्रयुक्त होता है ।

 यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।  कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥१७- २७॥ 

यज्ञ, तप तथा दान में स्थिर होने को भी सत कहा जाता है । तथा भगवान के लिये ही कर्म करने को भी 'सत' कहा जाता है ।

 अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।  असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥१७- २८॥ 

जो भी यज्ञ, दान, तपस्या या कार्य श्रद्धा बिना किया जाये, हे पार्थ उसे 'असत्' कहा जाता है, न उस से यहाँ कोई लाभ होता है, और न ही आगे ।


।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ।।



अठारहँवा अध्याय

अर्जुन बोले:

 संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।  त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८- १॥ 

हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग (कर्म योग) के सार को अलग अलग जानना चाहता हूँ ।

श्री भगवान बोले:

 काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।  सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥१८- २॥ 

बुद्धिमान ज्ञानी जन कामनाओं से उत्पन्न हुये कर्मों के त्याग को सन्यास समझते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग (कर्म योग) कहते हैं ।

 त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।  यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥१८- ३॥ 

कुछ मुनि जन कहते हैं की सभी कर्म दोषमयी होने के कारण त्यागने योग्य हैं । दूसरे कहते हैं की यज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये ।

 निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।  त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥१८- ४॥ 

कर्मों के त्याग के विषय में तुम मेरा निश्चय सुनो हे भरतसत्तम । हे पुरुषव्याघ्र, त्याग को तीन प्रकार का बताया गया है ।

 यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।  यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥१८- ५॥ 

यज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग करना उचित नहीं है - इन्हें करना चाहिये । यज्ञ, दान और तप मुनियों को पवित्र करते हैं ।

 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।  कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८- ६॥ 

परन्तु ये कर्म (यज्ञ दान तप कर्म) भी संग त्याग कर तथा फल की इच्छा त्याग कर करने चाहिये, केवल अपना कर्तव्य जान कर । यह मेरा उत्तम निश्चय है ।

 नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।  मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥१८- ७॥ 

नियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं हैं । मोह के कारण कर्तव्य कर्म का त्याग करना तामसिक कहा जाता है ।

 दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।  स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥१८- ८॥ 

शरीर को कष्ट देने के भय से कर्म को दुख मानते हुये उसे त्याग देने से मनुष्य को उस त्याग का फल प्राप्त नहीं होता । ऐसे त्याग को राजसिक त्याग कहा जाता है ।

 कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।  सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥१८- ९॥ 

हे अर्जुन, जिस नियत कार्य को कर्तव्य समझ कर किया जाये, संग को त्याग कर तथा फल को मन से त्याग कर, ऐसे त्याग को सातविक माना जाता है ।

 न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।  त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१८- १०॥ 

जो मनुष्य न अकुशल कर्म से द्वेष करता है और न ही कुशल कर्म के प्रति खिचता है (अर्थात न लाभदायक फल की इच्छा करता है और न अलाभ के प्रति द्वेष करता है), ऐसा त्यागी मनुष्य सत्त्व में समाहित है, मेधावी (बुद्धिमान) है और संशय हीन है ।

 न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।  यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥१८- ११॥ 

देहधारीयों के लिये समस्त कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है । परन्तु जो कर्मों के फलों का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी है ।

 अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।  भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१८- १२॥ 

कर्म का तीन प्रकार का फल हो सकता है - अनिष्ट (बुरा), इष्ट (अच्छा अथवा प्रिय) और मिला-जुला (दोनों) । जन्होंने कर्म के फलों का त्याग नहीं किया, उन्हें वे फल मृत्यु के पश्चात भी प्राप्त होते हैं, परन्तु उन्हें कभी नहीं जिन्होंने उन का त्याग कर दिया है ।

 पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।  सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१८- १३॥ 

हे महाबाहो, सभी कर्मों के सिद्ध होने के पीछे पाँच कारण साँख्य सिद्धांत में बताये गये हैं । उनका तुम मुझ से ज्ञान लो ।

 अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।  विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१८- १४॥ 

ये पाँच हैं - अधिष्ठान, कर्ता, विविध प्रकार के करण, विविध प्रकार की चेष्टायें तथा देव ।

 शरीरवाङ्‌मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।  न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१८- १५॥ 

मनुष्य अपने शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी कर्म का आरम्भ करता है, चाहे वह न्याय पूर्ण हो या उसके विपरीत, यह पाँच उस कर्म के हेतु (कारण) होते हैं ।

 तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।  पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१८- १६॥ 

जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि द्वारा केवल अपने आत्म को ही कर्ता देखता है (कर्म करने का एक मात्र कारण), वह दुर्मति सत्य नहीं देखता ।

 यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।  हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१८- १७॥ 

जिस में यह भाव नहीं है की 'मैंने किया है' और जिस की बुद्धि लिपि नहीं है (शुद्ध है), वह इस संसार में (किसी जीव को) मार कर भी नहीं मारता और न ही (कर्म फल में) बँधता है ।

 ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।  करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८- १८॥ 

ज्ञान, ज्ञेय (जाने जाने योग्य) औऱ परिज्ञाता - ये कर्म में प्रेरित करते हैं, और करण, कर्म और कर्ता - यह कर्म के संग्रह (निवास स्थान) हैं ।

 ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।  प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१८- १९॥ 

ज्ञान (कोई जानकारी), कर्म और कर्ता भी साँख्य सिद्धांत में गुणों के अनुसार तीन प्रकार के बताये गये हैं । उन का भी तुम मुझसे यथावत श्रवण करो ।

 सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।  अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥१८- २०॥ 

जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों में एक ही अव्यय भाव (परमेश्वर) को देखता है, एक ही अविभक्त (जो बाँटा हुआ नहीं है) को विभिन्न विभिन्न रूपों में देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्विक जानो ।

 पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।  वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥१८- २१॥ 

जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों को अलग अलग विभिन्न प्रकार का देखता है, उस ज्ञान दृष्टि को तुम राजसिक जानो ।

 यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।  अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८- २२॥ 

और जिस ज्ञान से मनुष्य एक ही व्यर्थ कार्य से जुड जाता है मानो वही सब कुछ हो, वह तत्वहीन, अल्प (छोटे) ज्ञान को तुम तामसिक जानो ।

 नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।  अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥१८- २३॥ 

जो कर्म नियत है (कर्तव्य है), उसे संग रहित और बिना राग द्वेष के किया गया है, जिसे फल की इच्छा नहीं रख कर किया गया है, उस कर्म को सात्विक कहा जाता है ।

 यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।  क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥१८- २४॥ 

जो कर्म बहुत परिश्रम से फल की कामना करते हुये किया गया है, अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया गया है, वह कर्म राजसिक है ।

 अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।  मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥१८- २५॥ 

जो कर्म सामर्थय का, परिणाम का, हानि और हिंसा का ध्यान न करते हुये मोह द्वारा आरम्भ किया गया है, जो कर्म तामसिक कहलाता है ।

 मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।  सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८- २६॥ 

जो कर्ता संग मुक्त है, 'अहम' वादी नहीं है, धृति (स्थिरता) और उत्साह पूर्ण है, तथा कार्य के सिद्ध और न सिद्ध होने में एक सा है (अर्थात फल से जिसे कोई मतलब नहीं), ऐसे कर्ता को सात्विक कहा जाता है ।

 रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।  हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥१८- २७॥ 

जो कर्ता रागी होता है, अपने किये काम के फल के प्रति इच्छा और लोभ रखता है, हिंसात्मक और अपवित्र वृत्ति वाला होता है, तथा (कर्म के सिद्ध होने या न होने पर) प्रसन्नता और शोक ग्रस्त होता है, उसे राजसिक कहा जाता है ।

 अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।  विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥१८- २८॥ 

जो कर्ता अयुक्त (कर्म भावना का न होना, सही चेतना न होना) हो, स्तब्ध हो, आलसी हो, विषादी तथा दीर्घ सूत्री हो (लम्बा खीचने वाला हो) (जिसकी कर्म न करने में ही रुची हो तथा आलस से भरा हो) - ऐसे कर्ता को तामसिक कहते हैं ।

 बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।  प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥१८- २९॥ 

हे धनंजय, अब तुम अशेष रूप से अलग अलग बुद्धि तथा धृति (स्थिरता) के भी तीनों गुणों के अनुसार जो भेद हैं, वे सुनो ।

 प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।  बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८- ३०॥ 

प्रवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म में लगना) और निवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म से मानसिक छुटकारा पाना) क्या है (तथा किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये और किस से निवृत्त होना चाहिये), कार्य क्या है, और अकार्य (कार्य न करना) क्या है, भय क्या है और अभय क्या है, किस से बन्धन उत्पन्न होता है, और किस से मोक्ष उत्पन्न होता है - जो बुद्धि इन सब को जानती है (इनका भेद देखती है), हे पार्थ वह बुद्धि सात्त्विकहै ।

 यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।  अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥१८- ३१॥ 

हे पार्थ, जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य अपने धर्म (कर्तव्य) और अधर्म को, तथा कार्य (जो करना चाहिये) और अकार्य को सार से नहीं जानता, वह बुद्धि राजसिक है ।

 अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।  सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥१८- ३२॥ 

हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य अधर्म को ही धर्म मानता है, अंधकार से ठकी जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य सभी हितकारी गुणों अथवा कर्तव्यों को विपरीत ही देखता है, वह बुद्धि तामसिक है ।

 धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।  योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८- ३३॥ 

हे पार्थ, जिस धृति (मानसिक स्थिरता) द्वारा मनुष्य अपने प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियमित करता है, तथा उन्हें नित्य योग साधना में प्रविष्ट करता है, ऐसी धृति सातविक है ।

 यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।  प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥१८- ३४॥ 

हे अर्जुन, जब मनुष्य फलों की इच्छा रखते हुये, अपने (स्वार्थ हेतु) धर्म, इच्छा और धन की प्राप्ति के लिये कर्मों तथा चेष्टाओं में प्रवृत्त रहता है, वह धर्ति राजसिक है हे पार्थ ।

 यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।  न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥१८- ३५॥ 

हे पार्थ, जिस दुर्बुद्धि भरी धृति के कारण मनुष्य स्वप्न (निद्रा), भय, शोक, विषाद, मद (मूर्खता) को नहीं त्यागता, वह तामसिक है ।

 सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।  अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥१८- ३६॥  यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।  तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥१८- ३७॥ 

उसी प्रकार, हे भरतर्षभ, तुम मुझ से तीन प्रकार के सुख के विषय में भी सुनो । वह सुख जो (योग) अभ्यास द्वारा प्राप्त होता है, तथा जिस से मनुष्य को दुखों का अन्त प्राप्त होता है, जो शुरु में तो विष के समान प्रतीत होता है (प्रिय नहीं लगता), परन्तु उस का परिणाम अमृत समान होता है (प्रिय लगता है), उस स्वयं की बुद्धि की प्रसन्नता (सुख) से प्राप्त होने वाले सुख को सात्विक कहा जाता है ।


 विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।  परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥१८- ३८॥ 

जो सुख भावना विषयों की इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होती है (जैसी स्वादिष्ट भोजन आदि), जो शुरु में तो अमृत समान प्रतीत होता है, परन्तु उसका परिणाम विष जैसा होता है, उस सुख को तुम राजसिक जानो ।

 यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।  निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८- ३९॥ 

जो सुख शुरु में तथा अन्त में भी आत्मा को मोहित करता है, निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाले ऐसी सुख भावना को तामसिक कहा जाता है ।

 न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।  सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥१८- ४०॥ 

ऐसा कोई भी जीव नहीं है, न इस पृथवि पर और न ही दिव्य लोक के देवताओं में, जो प्रकृति से उत्पन्न हुये इन तीन गुणों से मुक्त हो ।

 ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।  कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥१८- ४१॥ 

हे परन्तप, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के कर्म उन के स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार ही विभक्त किये गये हैं ।

 शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।  ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥१८- ४२॥ 

मानसिक शान्ति, संयम, तपस्या, पवित्रता, शान्ति, सरलता, ज्ञान तथा अनुभव - यह सब ब्राह्मण के स्वभाव से ही उत्पन्न कर्म हैं ।

 शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।  दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥१८- ४३॥ 

शौर्य, तेज, स्थिरता, दक्षता, युद्ध में पीठ न दिखाना, दान, स्वामी भाव - यह सब एक क्षत्रीय के स्वभाविक कर्म हैं ।

 कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।  परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥१८- ४४॥ 

कृषि, गौ रक्षा, वाणिज्य - यह वैश्य के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं । परिचर्य - यह शूद्र के स्वाभिक कर्म हैं ।

 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।  स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥१८- ४५॥ 

अपने अपने (स्वभाव से उत्पन्न) कर्मों का पालन करते हुये मनुष्य सिद्धि (सफलता) को प्राप्त करता है । मनुष्य वह सिद्धि लाभ कैसे प्राप्त करता है - वह तुम सुनो ।

 यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।  स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥१८- ४६॥ 

जिन (परमात्मा) से यह सभी जीव प्रवृत्त हुये हैं (उत्पन्न हुये हैं), जिन से यह संपूर्ण संसार व्याप्त है, उन परमात्मा की अपने कर्म करने द्वारा अर्चना कर, मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।

 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।  स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥१८- ४७॥ 

दूसरे का गुण संपन्न धर्म के बराबर अपना धर्म (कर्तव्य, कर्म) ही श्रेय है (बेहतर है), भले ही उस में कोई गुण न हों, क्योंकि अपने स्वभाव द्वारा नियत कर्म करते हुये मनुष्य पाप प्राप्त नहीं करता ।

 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।  सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥१८- ४८॥ 

हे कौन्तेय, अपने जन्म से उत्पन्न (स्वभाविक) कर्म को उसमें दोष होने पर भी नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि सभी आरम्भों में (कर्मों में) ही कोई न कोई दोष होता है, जैसे अग्नि धूँयें से ठकी होती है ।

 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।  नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥१८- ४९॥ 

हर जगह असक्त (संग रहित) बुद्धि मनुष्य जिसने अपने आप पर जीत पा ली है, हलचल (स्पृह) मुक्त है, ऐसा मनुष्य सन्यास (मन से इच्छा कर्मों के त्याग) द्वारा नैष्कर्म सिद्धि को प्राप्त होता है ।

 सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।  समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥१८- ५०॥ 

इस प्रकार सिद्धि प्राप्त किया मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त करता है, तथा उसके ज्ञान की क्या निष्ठा होती है वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो ।

 बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।  शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥१८- ५१॥  विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।  ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥१८- ५२॥  अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।  विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१८- ५३॥ 

पवित्र बुद्धि से युक्त, अपने आत्म को स्थिरता से नियमित कर, शब्द आदि विषयों को त्याग कर, तथा राग-द्वेष आदि को छोड कर, एकेले स्थान पर निवास करते हुये, नियमित आहार करते हुये, अपने शरीर, वाणी और मन को योग में प्रविष्ट करते हुये वह योगी नित्य ध्यान योग में लगा, वैराग्य पर आश्रित रहता है । तथा अहंकार, बल, घमन्ड, इच्छा, क्रोध और घर संपत्ति आदि को मन से त्याग कर, 'मैं' भाव से मुक्त हो शान्ति को प्राप्त करता है और ब्रह्म प्राप्ति का पात्र बनता है ।


 ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।  समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥१८- ५४॥ 

ब्रह्म के साथ एक हो जाने पर, वह प्रसन्न आत्मा, न शोक करता है न इच्छा करता है । सभी जीवों के प्रति एक सा हो कर, वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है ।

 भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।  ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥१८- ५५॥ 

उस भक्ति द्वारा वह मुझे पूर्णत्या, जितना मैं हुँ, सार तक मुझे जान लेता है । और मुझे सार तक जान लेने पर मुझ में ही प्रवेश कर जाता है (मुझ में एक हो जाता है) ।

 सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।  मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥१८- ५६॥ 

सभी कर्मों के सदा मेरा ही आश्रय लेकर करो । मेरी कृपा से तुम उस अव्यय शाश्वत पद को प्राप्त कर लोगे ।

 चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।  बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥१८- ५७॥ 

सभी कर्मों को अपने चित्त से मुझ पर त्याग दो (उन के फलों को मुझ पर छोड दो, और कर्मों को मेरे हवाले करते केवल मेरे लिये करो) । सदी इसी बुद्धि योग का आश्रय लेते हुये, सदा मेरे ही चित्त वाले बनो ।

 मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।  अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥१८- ५८॥ 

मुझ में ही चित्त रख कर, तुम मेरी कृसा से सभी कठिनाईयों को पार कर जाओगे । परन्तु यदि तुम अहंकार वश मेरी आज्ञा नहीं सुनोगे तो विनाश को प्राप्त होगे ।

 यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।  मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥१८- ५९॥ 

यदि तुम अहंकार वश (अहंकार का आश्रय लिये) यह मानते हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे, तो तुम्हारा यह व्यवसाय (धारणा) मिथ्या है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति तुम्हें (युद्ध में) नियोजित कर देगी ।

 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।  कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥१८- ६०॥ 

हे कौन्तेय, सभी अपने स्वभाव के कारण अपने कर्मों से बंधे हुये हैं । जिसे तुम मोह के कारण नहीं करना चाहते, उसे तुम विवश होकर फिर भी करोगे ।

 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।  भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१८- ६१॥ 

हे अर्जुन, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं और अपनी माया द्वारा सभी जीवों को भ्रमित कर रहे हैं, मानो वे (प्राणी) किसी यन्त्र पर बैठे हों ।

 तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।  तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥१८- ६२॥ 

उन्हीं की शरण में तुम संपूर्ण भावना से जाओ, हे भारत । उन्हीं की कृपा से तुम्हें परम शान्ति और शाश्वत स्थान प्राप्त होगा ।

 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया ।  विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥१८- ६३॥ 

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्य से भी गूह्य इस ज्ञान का वर्णन किया । इस पर पूर्णत्या विचार करके जैसी तु्म्हारी इच्छा हो करो ।

 सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।  इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥१८- ६४॥ 

तुम एक बार फिर से सबसे ज्यादा रहस्यमयी मेरे परम वचन सुनो । तुम मुझे बहुत प्रिय हो, इसलिये मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ ।

 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।  मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥१८- ६५॥ 

मेरे मन वाले बनो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करने वाले बनो, मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त करोगे, मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो ।

 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।  अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥१८- ६६॥ 

सभी धर्मों को त्याग कर (हर आश्रय त्याग कर), केवल मेरी शरण में बैठ जाओ । मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दुँगा, इसलिये शोक मत करो ।

 इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।  न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८- ६७॥ 

इसे कभी भी उसे मत बताना जो तपस्या न करता हो, जो मेरा भक्त ना हो, और न उसे जिसमें सेवा भाव न हो, और न ही उसे जो मुझ में दोष निकालता हो ।

 य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।  भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥१८- ६८॥ 

जो इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को बताता है, वह मेरी परम भक्ति करने के कारण मुझे ही प्राप्त करता है, इस में कोई संशय नहीं ।

 न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।  भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥१८- ६९॥ 

न ही मनुष्यों में उस से बढकर कोई मुझे प्रिय कर्म करने वाला है, और न ही इस पृथ्वि पर उस से बढकर कोई और मुझे प्रिय होगा ।

 अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।  ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥१८- ७०॥ 

जो हम दोनों के इस धर्म संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञान यज्ञ द्वारा मेरा पूजन करेगा, यह मेरा मत है ।


 श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।  सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥१८- ७१॥ 

जो मनुष्य इसको श्रद्धा और दोष-दृष्टि रहित मन से सुनेगा, वह भी (अशुभ से) मुक्त हो पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों में स्थान ग्रहण करेगा ।

 कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।  कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥१८- ७२॥ 

हे पार्थ, क्या यह तुमने एकाग्र मन से सुना है । हे धनंजय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न सम्मोह नष्ट हुआ है ।

अर्जुन बोले:

 नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।  स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥१८- ७३॥ 

हे अच्युत, आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ, और मुझे वापिस स्मृति प्राप्त हुई है । मेरे सन्देह दूर हो गये हैं, और मैं आप के वचनों पर स्थित हुआ आप की आज्ञा का पालन करूंगा ।

संजय बोले:

 इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।  संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥१८- ७४॥ 

इस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस अद्भुत रोम हर्षित करने वाले संवाद को सुना ।

 व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।  योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥१८- ७५॥ 

भगवान व्यास जी के कृपा से मैंने इस परम गूह्य (रहस्य) योग को साक्षात योगेश्वर श्री कृष्ण के वचनों द्वारा सुना ।

 राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।  केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥१८- ७६॥ 

हे राजन, भगवान केशव और अर्जुन के इस अद्भुत पुण्य संवाद को बार बार याद कर मेरा हृदय पुनः पुनः हर्षित हो रहा है ।

 तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।  विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥१८- ७७॥ 

और पुनः पुनः भगवान हरि के उस अति अद्भुत रूप को याद कर, मुझे महान विस्मय हो रहा है हे राजन, और मेरा मन पुनः पुनः हर्ष से भरे जा रहा है ।

 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।  तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८- ७८॥ 

जहां योगेश्वर कृष्ण हैं, जहां धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं पर श्री (लक्ष्मी, ऐश्वर्य, पवित्रता), विजय, विभूति और स्थिर नीति हैं - यही मेरा मत है ।


।। ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ।। ।। इस प्रकार भगवान वासुदेव द्वारा दिये ज्ञान - श्री भगवद गीत (श्रीमद गीता) का हिन्दी अनुवाद करने का मैंने प्रयत्न किया है । भगवान हम सब को बुद्धि दें की हम उन के इस अचिंतनीय अलौकिक ज्ञान को अपने जीवन में उतार पायें । जैसे भगवान हरि के चरण कमलों से निकल कर गँगा सारे संसार को पवित्र करती है, उसी प्रकार भगवान हरि के यह वचन हमारे जीवन को पवित्र करते हैं । श्रीमद भगवद गीता मनुष्य जीवन की गाथा है । जीवन क्या है, जीवन का उद्देश्य क्या है, जीव का धर्म क्या है, क्या प्राप्तव्य है, कैसे संकटों से मनुष्य छूटता है - यह सब भगवान हरि के इन वाक्यों द्वारा सपष्ट होता है । इस संसार के परम गुरु, भगवान जनार्दन को प्रणाम है । ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ।।

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