Thursday, December 18, 2008

देवभूमि के हर गांव में होती है देवता की पूजा

शिमला [योगराज शर्मा]। हिंदुस्तान ने भले ही चांद पर झंडा फहरा दिया हो, लेकिन इस वैज्ञानिक युग में भी लोगों की धार्मिक आस्था में कमी नहीं आई है। आज भी लोगों का कुल देवताओं के प्रति अटूट विश्वास है। देव भूमि हिमाचल में ऐसा कोई गांव नहीं है जहां किसी न किसी देवता की पूजा न की जाती हो। यह बात हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा किए गए शोध में सामने आई है। शोध में यह बात प्रमाणित होती है कि यहां देवताओं के प्रति आस्था की जडें बहुत गहरी हैं। यहां के देवता महाभारत कालीन हैं व पूजा की भी विधि भी उसी समय की है। शोध में कहा गया है कि यहां एक देवतंत्र विकसित रहा है। यहां विवादों का निपटारा आज भी देवता की अदालत में ही होता है व देव आदेश सभी को मान्य होते हैं। देव आदेश गुर [विशेष पुजारी] के माध्यम से दिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि देवता उसके मुख से अपना आदेश देते हैं, जो सभी को मान्य होता है।

विविके संस्कृत विभाग की ओर से यह शोध प्रोफेसर विद्या शारदा की देखरेख में यशपाल शर्मा व ओम प्रकाश सोलन व ऊपरी शिमला के विभिन्न क्षेत्रों में पूजेव माने वाले देवताओं पर किया है। यहां के देवता महाभारत कालीन हैं, कई स्थानों पर तो साक्षात पांडवों को ही देवता रूप में माना जाता है। प्रदेश में देव पूजा की आज भी वही विधि अपनाई जा रही है जो महाभारत काल के दौरान थी। हालांकि पूजा के दौरान बोले जाने वाले मंत्रों को पहाडी भाषा में अनुवाद किया गया है। शोध में ऊपरी शिमला व सोलन के विभिन्न क्षेत्रों के देवताओं पर गहन अध्ययन किया गया है।

यही नहीं, शोध में रोचक बात यह भी सामने आई है कि महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण व पांडवों के बीच युद्ध की रणनीति प्रदेश के सोलन जिले के बाडीधारनामक स्थान पर बनाई थी। महाभारत में पांडवों को भी देवांश के रूप में ही माना जाता है। इस प्रमाण महाभारत के आदि पर्व के पहले अध्याय के 114वेंश्लोक में भी मिलता है।

प्रो. शारदा का कहना है कि प्रदेश में आदि काल से ही देवतंत्रका प्रभाव रहा है। प्रदेश के खासकर सोलन ऊपरी शिमला के अधिकांश देवता महाभारत काल के हैं। पूजा की विधि भी महाभारत काल की ही अपनाई जा रही है। पूजा के दौरान बोले जाने वाले मंत्र पहाडी भाषा में हैं।

उदाहरण के तौर पर देवता का स्नान करने के लिए पौराणिक मंत्र गंगा चयमुना चैवगोदावरीसरस्वती। नर्मदा सिंधु कावेरीस्नानार्थप्रतिगृहताम्है। जबकि पहाडी विधि में इसी मंत्र को हर गंगा, नाहणगंगा, वाहणगंगा, जले गंगा, थलेविष्णु गंगा बडी गोदावरीतीर्थ बडा केदार, छाला पडे समुद्र की पाप कटे हरिद्वार, गया पडे बनारसी, नील कंठ नेपाल, श्री सोमनाथ हर-हर गंगा, नाहणगंगा।


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