Friday, July 18, 2008

गुरु महिमा

गुरु महिमा साधक को सिद्धि प्राप्त करने के लिए गुरु-कृपा और गुरु-प्रकाश की आवश्यकता होती है। गुरु ही वह ज्योति जलाता है जिससे साधक का अज्ञान-तिमिर से पूर्ण हृदय सहज ज्ञान के आलोक से आलोकित हो उठता है। इसी तथ्य को शास्त्रों और संतों द्वारा विविध रूपों में कहा गया है, गुरु‌र्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:H इसी को संत कबीर ने गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागूं पायं। बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिंद दियो बतायH कहकर उत्तम कल्याण (श्रेय) के जिज्ञासु के लिए शब्दज्ञानी (शास्त्रज्ञानी), तत्वज्ञानी (ब्रह्मज्ञानी) और ब्रह्मनिष्ठ (परमशांत) गुरु की शरण में जाने को कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव जी को आचार्य मां विजायीनात् समझाते हुए गुरु को अपना ही रूप बताया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो रामचरितमानस में प्रारंभ से ही गुरु की वंदना करते हुए यत्र-तत्र गुरुमहिमा का ही उन्मेश किया है। मंगलाचरण प्रकरण में जहां शुभ गुणों से युक्त गणेश जी की वंदना की है। गुरुदेव का उपदेश महामोह रूपी अंधकार को नष्ट करने वाला है। श्रीगुरु-चरण कमल की रज भी वंदनीय है। वह सुरुचि सुबास सरस के साथ ही समस्त सांसारिक दु:खों की विनाशक भी है। गुरुदेव के चरण-नख का ध्यान करते ही कल्याण हो जाता है। यह चरण-नख-ज्योति असंख्यमणियों के समान ही प्रकाशवान होकर हृदय के अज्ञान रूपी अंधकार को विनष्ट करते हुए हृदय को दिव्य दृष्टि से पूरित कर देती है और यह सब कुछ सुमिरत स्मरण करने मात्र से प्राप्त करने में समर्थ कर देती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने यहां तक विश्वासपूर्वक कहा है, सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू। वह स्वीकार करते हैं कि वे साधक धन्य हैं जिन्हें गुरुपद पंकजों से अनुराग होता है। गुरु-भक्ति को नवधा भक्ति प्रसंग में तीसरा स्थान देते हुए गोस्वामी जी ने अभिमानरहित होकर गुरु-भक्ति करने की नेक सलाह दी है, क्योंकि यही साधक के लिए अभेद्य कवच है जो साधक को संसार में अजेय बनाए रहता है। इसके रहते साधक भौतिक सुखों को महत्वहीन समझता है। गुरुकृपा ही वह पारसमणि है जिसके स्पर्श मात्र से मूल्यहीन वस्तु मूल्यवान हो जाती है। 2 डा. राजेन्द्र दीक्षित



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