Monday, August 18, 2008

कश्मीरियत का मतलब

सभ्य समाज के लिए इंटरनेट के फायदों से कौन इनकार कर सकता है, लेकिन संचार का यह माध्यम अब चरमपंथ और अलगाववाद का भी उपकरण बन गया है। इस सप्ताह की शुरुआत में मुझे किसी डा. अब्दुल रुफ कोलाचल का लेखन पढ़ने को मिला। वह जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के स्कालर होने का दावा करते हैं। उनके बारे में थोड़ी-बहुत और खोजबीन करने पर पता चला कि कोलाचल का जन्म तमिलनाडु में हुआ और वह मैसूर विश्वविद्यालय में अध्यापन कर चुके हैं। उनके कुछ लेख एक कश्मीरी समाचार पत्र में भी छप चुके हैं। अलगाववाद समर्थक कश्मीरवाच डाट काम में वह भारत के खिलाफ अपना गुस्सा उतारते हैं-भारतीय मीडिया ने पैसे और समर्थन के आधार पर छद्म राष्ट्रवादी शक्तियों के एक बड़े वर्ग का निर्माण कर भारतीय शासकों की सफलतापूर्वक मदद की है। अपने आरोप के समर्थन में वह बीजिंग में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा के मीडिया में छा जाने का उदाहरण देते हैं। वह लिखते हैं-जब एक भारतीय ने निशानेबाजी में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता तो पूरे देश और खासकर मुस्लिम विरोधी मीडिया ने उनकी बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ उनकी उपलब्धि को आजादी के बाद की सबसे महत्वपूर्ण घटना बताया। निशानेबाजी तो आतंकी गतिविधियों के लिए जरूरी कौशल है और भारतीय जिस तरह शूटिंग में मिले पदक की सराहना कर रहे हैं उससे भारतीयों की आतंकवाद समर्थक मानसिकता उजागर होती है। भारतीय मानसिकता के संदर्भ में इस नवीन अंतदर्ृष्टि में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि ऐसी मानसिकता का क्या वास्तव में अस्तित्व है, बल्कि यह है कि इसके बीज उन लोगों द्वारा बोए जा रहे हैं जो इस्लाम की आजादी के आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। सोचे-समझे ढंग से किया जा रहा यह प्रयास कश्मीर घाटी में तेजी से अपना असर फैला रहा है। शायद इस कोशिश से हमें चौंकना नहीं चाहिए। पिछले दो दशक से घाटी के अलगाववादी नेता ने दोहरे आचरण और दोहरी भाषा में महारथ हासिल कर ली है। उदाहरण के लिए हुर्रियत कांफ्रेंस के नेतृत्व ने अपनी एक भाषा मीडिया, बौद्धिक जनों तथा पश्चिमी राजनयिकों के लिए आरक्षित कर ली है। इस भाषा में सशक्तीकरण, सभ्य समाज, दोहरी संप्रभुता जैसे शब्दों का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। अलगाववादियों का एक और पक्ष तब प्रकट हो जाता है जब उनके नेता अपने साथियों से बात करते हैं। जरा हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के उस बयान पर निगाह डालिए जो उन्होंने अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में दिया। गिलानी कहते हैं-भारत सरकार ने एक खास मकसद से अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को कश्मीर भेजा है। इस कृत्रिम तीर्थस्थल में यात्रियों और पर्यटकों को भेजने के पीछे कश्मीर पर अपना कब्जा मजबूत करने का मकसद है ताकि आगे चलकर कश्मीर के संदर्भ में भी वैसा ही दावा किया जा सके जैसा दावा फलस्तीन क्षेत्र के लिए यहूदी करते हैं। इस मकसद को पूरा करने के लिए ही अमरनाथ श्राइन बोर्ड की स्थापना की गई। कश्मीरियों को अमरनाथ यात्रा से कभी परेशानी नहीं हुई, लेकिन एक बार जब यह यात्रा अपना कब्जा मजबूत करने का उपकरण बन गई तो कश्मीरियों को चिंता हुई। अब जरा कल्पना करें कि तोगडि़या जैसे लोग यदि यह कहने लगें कि हज का स्थान आतंकवादी विचारधारा के प्रसार का उपकरण बन गया है और इसे रोका जाना चाहिए तब क्या होगा? यह भी तो कहा जा सकता है कि पहले से तंग हमारे हवाई अड्डे हाजियों के आवागमन का बोझ नहीं उठा सकते और यह भी कि विशेष हर्ज टर्मिनल स्थापित करना भारतीय पहचान को नष्ट करने का कार्य करेगा। क्या ऐसे विचार व्यक्त करने वाले लोगों को एक दिन के लिए भी बख्शा जाएगा? कश्मीर में चल रहे आंदोलन का न तो कश्मीरी पहचान से कोई लेना-देना है और न ही उस विशिष्ट कश्मीरियत से जिस पर गिलानी जोर दे रहे हैं। यह एक स्पष्ट अलगाववादी आंदोलन है, जो इस मान्यता पर आधारित है कि एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र में एक पृथक इस्लामी राज्य अवश्य होना चाहिए। अब इसे गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में हुए बम धमाकों से अलग नहीं रखा जा सकता। ये बम धमाके भी इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लोकतंत्र और राष्ट्रवाद की अस्वीकृति की घोषणा हैं। दूसरी तरह कहें तो भारत की एकता और व्यक्तित्व पर दोहरा आघात किया जा रहा है। इसका दिखाई देने वाला एक स्वरूप घाटी में है और दूसरा अदृश्य स्वरूप अन्यत्र हमारे शहरों में बम धमाकों के रूप में महसूस किया जा सकता है। इन दोनों स्वरूपों को नियंत्रित करने वाली ताकतें एक ही हैं, जैसा कि गुजरात पुलिस ने गत दिवस खुलासा किया। कश्मीरी अलगाववादी भारत से अलग हो जाना चाहते हैं, क्योंकि वे अपने लिए पृथक राज्य चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने 1990 में घाटी से अल्पसंख्यक हिंदुओं को बाहर निकाल दिया। सिमी और इंडियन मुजाहिदीन हिंदू भारत को तबाह कर देना चाहते हैं, क्योंकि वे केवल एक इस्लामिक राज्य में रह सकते हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के पास खासा जन समर्थन है और अब आतंकवाद ने व्यापक घरेलू नेटवर्क बना लेने के प्रमाण दिए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब घाटी की घटनाओं को राष्ट्रीयता के लिए खतरा बताते हैं तब वह सही होते हैं, लेकिन आश्चर्य है कि वह जम्मू के आंदोलन की तुलना कश्मीर में चल रहे घटनाक्रम से कर बैठते हैं। इस दृष्टिकोण का खोखलापन श्रीनगर में स्वतंत्रता दिवस पर उजागर हो गया जब अलगाववादियों ने लाल चौक पर भारतीय ध्वज तहस-नहस कर दिया और उसके स्थान पर पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया। दूसरी ओर जम्मू में यह आम जनता का स्वतंत्रता दिवस था, जहां केवल एक ध्वज-भारतीय तिरंगा लहरा रहा था। क्या हम अब भी राष्ट्रवादियों की तुलना उन लोगों से कर सकते हैं जो भारत को तोड़ देना चाहते हैं? (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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