Wednesday, July 2, 2008

कंबोडियाई हिन्दू मंदिर का विवाद सुलझने के आसार


थाईलैंड की सीमा से थोड़ा आगे बढ़ते ही पहाड़ की एक चोटी पर स्थित 11वीं सदी में बना प्रीह विहीर मंदिर है जहां से कंबोडिया के जंगलों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
कंबोडिया के सुप्रसिद्ध अंकोरवट के बाद प्राचीन खमेर वास्तुशिल्प का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नमूना है यह हिन्दू मंदिर। अब खंडहर हो चुके इस मंदिर ने सदियों तक युद्ध की विभीषिका झेली है। थाईलैंड के साथ इसके इलाके को लेकर लम्बे समय से विवाद चलता रहा है।
दो सप्ताह पहले इस विवाद के समाप्त होने की आशा तब दिखाई पड़ी जब थाईलैंड ने संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत के रूप में मंदिर को अधिसूचित करने हेतु कंबोडिया को आवेदन करने के लिए हरी झंडी दिखा दी। इस कदम से सैलानियों को आकर्षित करने में और मंदिर के रखरखाव को सुरूचिपूर्ण रखने में मदद मिलेगी। यूनेस्को की 21 देशों वाली समिति कनाडा के क्यूबेक शहर में बुधवार को आयोजित होने वाली अपनी सालाना बैठक में इस आवेदन पर विचार करेगी।
लेकिन इस कदम से थाईलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल मच गयी है। पिछले सप्ताह कंबोडिया ने खंडहर से लगती अपनी सीमा को बंद कर दिया था क्योंकि 100 से भी ज्यादा थाई प्रदर्शनकारियों ने मंदिर पर प्रदर्शन करने के लिए सीमा पार कर जाने की कोशिश की थी। इसके बाद थाईलैंड की एक अदालत ने सरकार के इस कदम पर रोक लगा दी जिससे वह कंबोडिया के प्रयास को अब अपना समर्थन नहीं दे सकेगा। थाईलैंड से लगी चौकी के उपप्रमुख नूथ बुनसोय ने कहा कि मैंने इस मामले पर थाई लोगों से कई बार बहस की है। अगर मंदिर को विश्व विरासत स्थल के रूप में अधिसूचित किया जाता है तो अब हमारे कंबोडियाई लोग चिंतित नहीं होंगे।
उल्लेखनीय है कि भगवान शिव को समर्पित प्रीह विहीर मंदिर थाईलैंड से लगी सीमा पर स्थित डेंगरेक पर्वतीय श्रृंखला की एक चोटी पर स्थित है। 1950 में थाई सैनिकों ने पत्थरों की सीढ़ियों और शानदार नक्काशी वाले इस मंदिर के परिसरों पर कब्जा कर लिया था लेकिन 1962 में एक विश्व अदालत ने कहा कि यह मंदिर कंबोडिया का है जिसके बाद थाईलैंड ने इस पर अपना कब्जा छोड़ दिया। हालांकि मंदिर कंबोडिया के क्षेत्र में है लेकिन मंदिर की सीढ़ियां थाईलैंड के इलाके में हैं जिसके कारण दोनों देशों के बीच इस बात को लेकर विवाद होता रहता है कि इस मंदिर का प्रबंधन कैसे किया जाए।
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