Wednesday, July 2, 2008

सैम बहादुर जिंदाबाद


वे आजाद भारत के सबसे सम्मानित सिपाही और हमारी महानतम उपलब्धि 1971 विजय के नायक थे। अगर वे इजराइल में होते शायद राष्ट्रपति हुए होते, लेकिन हमारे यहांऐसा नही होता। हमारे यहां ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग ऐसे व्यक्तित्वों के सम्मुख अपने को असुरक्षित महसूस करते है। ऐसे लोगों को कलाम को राष्ट्रपति बना देने के बाद अफसोस होने लगता है। अगर सैम मानेकशा अमेरिका में रहे होते तो उनका जनरल मैकार्थर या आइजनहावर जैसा सम्मान होता, लेकिन हमारे यहां तो वही कहावत 'रे गंधी मति अंध तू अतर दिखावत काहि' चलेगी। रिटायर होने के बाद उनकी सेवाओ का कोई उपयोग नहीं किया गया। हां, वे प्राइवेट कारपोरेशनों में डायरेक्टर वगैरह जरूर रहे। यहां आजादी के बाद यह कहा गया कि हमें सेनाओं की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में सैनिकों को अपना सम्मान बचाए रखना कोई आसान काम नहीं है। आजादी के बाद हमने राष्ट्र की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को गांधीवाद से परिभाषित करने का प्रयास किया। इसके लिए हमने राजनीति, सत्ता और शक्ति संतुलन के मान्य सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया। हम भूल गए कि नीतिगत परिवर्तन के बाद अशोक के अहिंसक साम्राज्य का क्या हुआ था? ईदी अमीन, माओ, स्टालिन, तालिबान के सामने कौन सा गांधीवादी आंदोलन चलाया जा सकता था। गांधीवाद राष्ट्र राज्य को परिभाषित नही करता। इसलिए गांधीवाद को सेनाओं की आवश्यकता भी नही थी। गांधीवाद हृदय परिवर्तन में विश्वास करता है। गांधीवाद सब कुछ के बावजूद विभाजन की विभीषिका को नही टाल सका। दंगे नही टाल सका। जिन्ना का हृदय परिवर्तन नही हुआ। गांधीवाद की नैतिकता हमारे समाज की समरसता के लिए आदर्श तो है, लेकिन वर्तमान विश्व में विदेश एवं रक्षा नीतियो का संचालन गांधीवादी नजरिये से किया जाना संभव नहीं। 1947 के कश्मीर युद्ध में पाकिस्तानियों को आधी दूर तक खदेड़ने के बाद अचानक हम गांधीवादी हो गए और समस्या संयुक्त राष्ट्र में लेकर चले गए। 1962 की जंग में जनरल कौल ने फारवर्ड पालिसी के रूप में सेनाओं का सत्याग्रह जैसा कुछ चलाया था। नतीजा बहुत बुरी हार में सामने आया। आज हमारे सामने कश्मीर समस्या, चीन सीमा विवाद जैसे नासूर हैं। हमने सेनाओं को बोझ समझा और सैन्य कमांडरों को ब्रिटिश परंपरा की छूटी हुई निशानी माना। दुनिया के किसी भी देश में सैन्य रणनीति के हमारे यहां जैसे नाजानकार राजनीतिज्ञ शायद ही कहीं मिलें। हमारा नेतृत्व हममें वह धैर्य, वह क्षमता नही विकसित कर सका है जो मुश्किलों को सामने देखकर जूझने का जज्बा पैदा कर देती है। वह कौन सी कायरता हमारे खून में है जो हमें कभी हाजीपीर वापस करने को मजबूर कर देती है, कभी अमेरिकी धमकियों से डर कर 1971 में एक तरफा युद्ध विराम घोषित कराती है? वे कौन सी मजबूरियां है जो कारगिल युद्ध में हमारी सेनाओं को एक हाथ बांधकर लड़ने को मजबूर करती हैं कि हम एलओसी पार नहीं करेगे। हमारा नेतृत्व जो गूजरों के पटरियो पर बैठने से, सिलीगुड़ी में गोरखाओ के बंद से, पंजाब में तलवारों के जुलूस से डर जाता है उसमें अंतराष्ट्रीय दबावों, अमेरिकी धमकियों, आतंकी धमाकों का सामना करने की क्षमता कहां से आएगी? सत्ता की बाजीगरी के लिए मदारियों के समान खेल दिखाते और सैनिकों से सशंकित ये लोग सैम मानेकशा या जनरल दयाल को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के पदों पर बरदाश्त नही कर पाएंगे। 1971 के युद्ध के बाद जब सैम की लोकप्रियता आकाश छू रही थी तो चिंतित दलालों ने उनकी लोकप्रियता को तोड़ने के लिए खेल रचा। सैम के पाकिस्तान भ्रमण के दौरान मजाक में की गई एक टिप्पणी कि अगर मै पाकिस्तान का जनरल होता तो बिसात पलट देता, को इस कदर तूल दिया गया कि सैम को उससे उबरने में ही काफी समय लगा। वह व्यक्ति जिसने सम्मान के लिये तरस रहे देश को हजारों साल के इतिहास की महानतम विजय दिलाई उसके ऊपर टुच्चों ने छींटाकशी करने का काम किया। सैम से एक शिकायत भी रह है। अगर उन्होने पूर्वी पाकिस्तान पर हमले का समय अपनी मर्जी से चुना था तो शायद वे युद्ध खत्म होने का समय भी तय कर सकते थे। युद्ध विराम एक राजनीतिक फैसला था, लेकिन अगर सैम अपनी जिद पर आ जाते तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए नेताओं के विरोध और दबावो के बावजूद ज्यादा नहीं तो एक सप्ताह भर लड़ाई और खींच ले जाते। इतने में शायद पश्चिमी मोर्चा भी फतह हो जाता फिर कश्मीर मुद्दा वह न होता जो आज है। वे सामने से ललकारने वाले सैन्य नेता थे। दफन होने से पहले अगर उनके ताबूत को खोलकर देखा जा सकता तो उनके सीने पर अराकान, बर्मा में लगी 18 गोलियों के निशानों को गिना जा सकता था।


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